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चेर्नोबिल का दर्द


तेईस साल पहले, २६ अप्रैल की सुबह (ठीक 0१.२४ बजे) दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु हादसा घटित हुआ। युक्रेन स्थित चेर्नोबिल पावर प्लांट का एक रिएक्टर फट गया। दो धमाकों ने रिएक्टर की छत को उड़ा दिया, और उसके अन्दर के रेडियो धर्मी पदार्थ बाहर को बह निकले। बाहर की हवा ने टूटे रिएक्टर के अन्दर पहुँच कार्बन मोनोक्ससाइड को ज्वलित कर दिया। इसके फलस्वरूप आग लग गयी जो नौ दिन तक धधकती रही। क्योंकि रिएक्टर के चारों ओर कांक्रीट की दीवार नहीं बनी थी, इसलिए रेडियो धर्मी मलबा वायुमंडल में फैल गया।

इस दुर्घटना में जो रेडियो धर्मी किरणें निकलीं वे हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए ऎटम बम से १०० गुना अधिक थीं। अधिकतर मलबा, चेर्नोबिल के आस पास के इलाकों में गिरा, जैसे युक्रेन, बेलारूस और रूस। परन्तु रेडियो धर्मी पदार्थों के कण, उत्तरी गोलार्ध के तकरीबन हर देश में पाये गए।

इस हादसे में ३२ व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी तथा अगले कुछ महीनों में ३८ अन्य व्यक्ति रेडियो धर्मी बीमारियों के कारण मर गए। ३६ घंटों के अन्दर करीब ५९४३० लोगों को वहाँ से निकाल कर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया गया।

इस भयानक दुर्घटना के कारण २००,००० व्यक्तियों को विस्थापित होना पड़ा, धरती का एक बड़ा भाग प्रदूषित हुआ और अनेको की रोज़ी रोटी का नुकसान हुआ। सन २००५ की एक रिपोर्ट के अनुसार, करीब ६००,००० लोग तीव्र रेडियो धर्मिता के शिकार बने तथा इनमें से ४००० लोग कैंसर से मृत्यु के शिकार हुए। इस पूरे प्रकरण में २०० अरब डॉलर का संभावित नुकसान हुआ।

इसके अलावा, जीवित व्यक्तियों की मानसिकता पर जो प्रभाव पड़ा, उसको नहीं मापा जा सकता है। हादसे के बाद कई लोग शराबी हो गए, और कई लोगों ने आत्म हत्या कर ली।

चेर्नोबिल दुर्घटना के अलावा अन्य कई परमाणु संयंत्र हादसे हो चुके हैं। सबसे पहली दुर्घटना १२.३.१९५२ को कनाडा स्थित चाक रिवर फसिलिटीमें घटी। एक कर्मचारी ने गलती से दाब नियनत्रक संयत्र के चारों वाल्व खोल दिए। परिणाम स्वरुप, संयंत्र का ढक्कन उड़ गया और बहुत अधिक मात्रा में परमाणु कचरे से दूषित शीतलन जल बाहर फैल गया।

दूसरा हादसा २९.९.१९५७ को रूस के पहाड़ी इलाके में स्थित मायक प्लुटोनियम फसिलिटीमें हुआ। यह हादसा तो चेर्नोबिल से भी खतरनाक माना जाता है। शीतलन संयंत्र में खराबी आ जाने के कारण, गरम परमाणु कचरा फट पड़ा। २७०,००० व्यक्ति एवं १४,००० वर्ग मील क्षेत्र रेडियो धर्मी विकिरण की चपेट में आ गए। इतने वर्षों के बाद भी, इस क्षेत्र के विकिरण स्तर बहुत अधिक हैं। और वहाँ के प्राकृतिक जल स्त्रोत आज भी नाभिकीय कचरे से दूषित हैं।

इंगलैंड स्थित विंड स्केल न्यूक्लिअर पॉवर प्लांट' के हादसे में विकिरण रिसाव के कारण, २०० वर्ग मील क्षेत्र दूषित हो गया।

७.१२.१९७५ को जर्मनी में लुब्मिन न्यूक्लिअर प्लांट' में खराबी आ गयी। परन्तु शीतलक प्रवाह हो जाने के कारण, एक बड़ी दुर्घटना होते होते बच गयी।

२९.३.१९७९ के दिन अमरीका में पेन्सिल्वेनिया का थ्री माइल आइलैंडहादसा भी शीतलन संयंत्र में खराबी आ जाने के कारण हुआ। आस पास के निवासियों को समय रहते वहाँ से निकाल लिया गया। परन्तु फिर भी इस इलाके में कैंसर और थायरोइड के रोगियों की संख्या में वृद्धि हुई है तथा बच्चों की मृत्यु डर में भी इजाफा हुआ है।

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तोकैमुरा हादसा' जापान में, ३०.९.१९९९ को घटित हुआ, जब आडविक ईंधन बनाने हेतु, गलती से नाइट्रिक एसिड में बहुत अधिक मात्रा में युरेनियम मिला दिया गया ---- ५.२ पाउंड के स्थान पर ३५ पाउंड। इसके फलस्वरूप नाभिकीय विखंदन विस्फोट २० घंटों तक अनवरत होता रहा। संयंत्र के ४२ कर्मचारी हानिकारक विकिरण के शिकार हुए, जिनमें २ की मृत्यु हो गयी।

परमाणु ऊर्जा समर्थक चाहे कुछ भी कहें, परन्तु किसी भी आडविक संयंत्र का सौ प्रतिशत सुरक्षित होना असंभव है, चाहे जितने भी कड़े सुरक्षा प्रबंध किए जाएँ। ये मनुष्यों, पशुओं एवं वातावरण को दूषित करते ही हैं। हानिकारक नाभिकीय विकिरणों का कुप्रभाव लंबे समय तक चलता है तथा इसका प्रमात्रण करना कठिन होता है। डाक्टर जॉन गोफमान (जो परमाणु ऊर्जा विरोधी अभियान के जनक माने जाते हैं) के अनुसार, ‘ विकिरण की कोई सुरक्षित मात्रा होती ही नही है। कोई न्यूनतम सुरक्षित सीमा नही है। यदि यह सत्य सबको विदित हो, तो कोई भी अनुग्यापित विकिरण वास्तव में हत्या के परमिट के समान है।

सन १९९६ में किए गए डाक्टर गोफमान के अनुमान के अनुसार, अमेरिका में कैंसर का एक प्रमुख कारण चिकित्सीय विकिरण है। अमेरिकन सरकार ने उनके इस दावे का खंडन तो किया है, परन्तु ध्यान देने योग्य बात यह है कि, सन १९७९ के हादसे के बाद अमेरिका में कोई भी परमाणु ऊर्जा संयंत्र नहीं लगाया गया है।

जब परमाणु ऊर्जा का तथाकथित शांतिमय प्रयोग इतना विनाश कर सकता है, तो फिर परमाणु शस्त्रों की विध्वंसकारी शक्ति के बारे में सोच कर ही डर लगता है। परमाणु अस्त्र मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। इस समय, सम्पूर्ण विश्व में २६,००० परमाणु अस्त्र हैं, जिनमें से ९६% अमेरिका और रूस के नियंत्रण में हैं। उनमें इतनी शक्ति है कि कुछ ही मिनटों में, हिरोशिमा विभीषिका का ७०,००० गुना विनाश करके हमारी सुंदर धारा को पूर्ण रुप से ध्वस्त कर दें। हम भले ही, जान बूझ कर छेड़े गए परमाणु युद्ध की संभावना को नकार दें, परन्तु दुर्घटना वश आरम्भ हुए आडविक हादसे की सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता।

स्टोक होल्म इन्टरनेशनल पास रिसर्च इंस्टिट्यूटके अनुसार, सन २००७ में वैश्विक सैन्य व्यय $१.३ खरब था। दस साल पहले किए गए एक और सर्वेक्षण के अनुसार अमेरिकी परमाणु अस्त्रों का मूल्य $५.८ खरब से भी अधिक है। ये सब बहुत ही भारी मात्रा के निवेश हैं, तथा इनका प्रयोग मानव उत्थान के कार्यों के लिए होना हीश्रेयस्कर है।

अभी हाल ही में, अमेरिका के राष्ट्रपति, श्री बराक ओबामा ने घोषणा करी है कि वो पृथ्वी से परमाणु अस्त्रों का नामोनिशाँ तक मिटा देना चाहते हैं। इस निर्भीक वक्तव्य के लिए उन्हें वाह वाही भी मिली है। परन्तु यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा कि ये सब कोरी लफ़्फ़ाज़ी है, या वास्तव में वे अपने देश के विनाशकारी अस्त्रों का अंत करने के सफल प्रयास करेंगें।

यूनाइटेड नेशन के सेक्रेटरी जनरल, बन की मून, भी मानते हैं कि परमाणु अस्त्रों से रहित विश्व की रचना ही वैश्विक जनता की सबसे क्षेष्ट सेवा है। वो यह भी स्वीकार करते हैं कि परमाणु अस्त्रों का इतना विरोध होने पर भी, नि:शस्त्रीकरण केवल एक इच्छा मात्र है। केवल विरोध करने से कुछ नहीं होगा। और भी ठोस कदम उठाने होंगें।

धार्मिक गुरु, श्री दलाई लामा वाह्य नि:शस्त्रीकरण के रूप में सभी परमाणु हथियारों पर रोक लगाने का निवेदन करते हैं. उनके अनुसार, इस कार्य को आतंरिक नि:शस्त्रीकरण के द्बारा ही किया जा सकता है। अर्थात हमें मन, वचन और कर्म से हिंसा का त्याग करना होगा। हिंसात्मक व्यवहार से केवल कष्ट मिलता है। दूसरों के प्रति संवेदनशीलता एवं प्रेम से ही खुशी मिलती है। यदि हम सभी एकजुट होकर शांती की आकांक्षा रखें तो युद्ध के खतरे को रोका जा सकता है तथा शस्त्र नियंत्रण भी किया जा सकता है। परमाणु युद्ध के भय से स्थाई शांती नहीं स्थापित की जा सकती है। सैन्य शक्ति के बल पर विश्व एवं मानव सुरक्षा नहीं प्रदान की जा सकती है। हमें यह याद रखना होगा कि नि:शस्त्रीकरण का वास्तविक अर्थ है हिंसा एवं युद्ध का न होना। इसका वास्तविक अर्थ है, एक शांतिप्रिय जीवन, मानव अधिकारों के प्रति आदर भाव और एक बेहतर पर्यावरण सुरक्षा।

शोभा शुक्ला
(लेखक सिटिज़न न्यूज़ सर्विस की संपादिका हैं)

फिर न हों हिरोशिमा, नागासाकी, चेर्नोबिल

अफलातून भाई का मूल आलेख उनके ब्लॉग पर है.

फिर न हों हिरोशिमा ,नागासाकी ,चेर्नोबिल

अगस्त 7, 2008 Aflatoon अफ़लातून द्वारा

   
बहरहाल , आज हम परमाणु उर्जा के कथित शंतिमय प्रयोग की विध्वंसक घटना चेर्नोबिल की चर्चा करेंगे । गुजरात के वरिष्ट गांधीजन कांति शाह के चेर्नोबिल की विभीषिकानामक आलेख के आधार पर यह प्रस्तुति है । आलेख के साथ साथ हम चेर्नोबिल दुर्घटना पर बी बी सी के वृत्त चित्र को भी दिखाते जाएंगे ।

दुनिया को परमाणु बिजली संयंत्र के राक्षसी स्वरूप का तार्रुफ़ चेर्नोबिल करा गया है । २६ अप्रैल , १९८६ को चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र का एक रिएक्टर विस्फोट के साथ फटा। २८०० डिग्री सेन्टिग्रेड की गर्मी से उसकी अग्निज्वाला भभक रही थी , रेडियोधर्मी विकिरण उगलती हुई ।

दुर्घटना के चार माह बाद उसका पोस्टमार्टम करने के लिए इन्टरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेन्सी ( IAEA ) ने विएना में सम्मेलन आयोजित किया । दुनिया भर के ४२ देशों के करीब ५०० शीर्षस्थ परमाणु वैज्ञानिकों तथा विशेषज्ञों ने इसमें भाग लिया । रूस के प्रतिनिधिमण्डल की रहनुमाई कर रहे लेगासोव ने विस्तृत विवरण तथा दुर्घटना के विडियो प्रस्तुत किए । इस विडियो को देख लंदन के ऑब्ज़र्वरके नुमाइन्दे जेफ़ी ली ने लिखा :

हम नज़र के सामने परमाणु रिएक्टर को भयंकर रूप से भभक कर जलते हुए देख रहे थे । हमारी साँस अटक गयी थी । सब को हिला देने वाले लमहे थे । परमाणु उद्योग के सर्वोच्च संचालक यहाँ जुटे थे । अब तक  कट्टर धार्मिक जुनून की भाँति वे बाँग देते आए थे कि परमाणु संयंत्र सम्पूर्ण सुरक्षित हैं तथा ऐसी दुर्घटना की लेश मात्र संभावना नहीं है । परंतु यहाँ अपनी नजरों के सामने वे दोजख़ के विकराल जबड़ों जैसी दारुण घटना को भयभीत नजरों से निहार रहे थे ।

परमाणु रिएक्टर भीषण विस्फोट के साथ फटा। मानो उस के भीतर आधे TNT का बम फटा हो ! अमेरिकन पत्रिका न्यू साइन्टिस्ट के शब्दों में – ” यह लगभग परमाणु बम फटने जैसा था । अमेरिकी साप्ताहिक न्यूजवीक के अनुसार – ” हिरोशिमा और नागासाकी पर छोड़े गए परमाणु बम के वक्त जितना विकिरण हुआ था , उतना अथवा उससे अधिक विकिरण चेर्नोभिल की दुर्घटना के वक्त फैला था ।

रिएक्टर के अलावा आसपास के तीसेक स्थानों पर आग की प्रचण्ड ज्वाला भभक रही थी । संयत्र की छत एक विस्फोट के साथ उड़ गयी थी ।रेडियोधर्मी पदार्थ चारों तरफ फैल रहा था । वह भी धधक रहा था । नतीजन ,मानो  ’परमाणु आतिशबाजी हो रही थी । हवा की दिशा के मुताबिक रेडियोधर्मी परमाणु रज रूस और यूरोप के अन्य देशों में छा रहे थे ।

दुनिया को दुर्घटना की सूचना इससे फैले विकिरण ने ही दी । स्वीडन के बाल्टिक सागर के तट पर एक परमाणु संयंत्र स्थापित है ।इस संयंत्र से सुरक्षित स्तर से अधिक विकिरण तो नहीं हो रहा है इसकी पड़ताल के लिए करीब चार किलोमीटर दूर रेडिएशन डिटेक्टरस्थापित है । विकिरण की मात्रा प्रति घण्टे ढाई मिलिरेम से नीचे होने पर नीली बत्ती जलती है ढाई से १०० मिलिरेम तक पीली तथा १०० मिलिरेम से ज्यादा विकिरण फैल रहा हो तब लाल बत्ती जलने लगती है ।

२८ अप्रैल की सुबह यह डिटेक्टर प्रति घण्टे १० मिलिरेम दिखाने लगा । तत्काल सुरक्षा के कदम उठाए जाने लगे । संयंत्र बन्द कर दिया गया । परन्तु धीरे धीरे यह समझ में आया कि यह विकिरण स्वीडन के किसी संयंत्र से नहीं हो रहा है , अन्यत्र कहीं दूर से आ रहा है ।ज्यदा जाँच से पता चला कि विकिरण के विस्फोट के पहले चिह्न २७ तारीख़ को दोपहर दो बजे के करीब प्रकट हुए थे । अनुमान लगाया गया कि २६ तारीख़ रात से २७ तारीख़ सुबह के बीच कहीं कोई घटना हुई होनी चाहिए । क्या चीन ने वातावरण में परमाणु परीक्षण कर दिया ? परन्तु नहीं , इस विकरण का प्रकार इशारा दे रहा था कि किसी परमाणु संयंत्र से यह हो रहा है । यह भी लगा कि इसका स्रोत सोवियत रूस में है ।

स्वीडन ने अमेरिका को सावधान किया । अमेरिका ने उपग्रह द्वारा निरीक्षण करने की अपनी समूची प्रणाली को काम पर लगा दिया। इससे पता चला कि रूस के कीव इलाके में परमाणु संयंत्र में दुर्घटना की संभावना है । पहले अमेरिकी वैज्ञानिक यह मान ही नहीं सके कि इतनी बड़ी दुर्घटना हो सकती है । २९ तारीख़ की भोर में फौजी जासूसी उपग्रह से उस इलाके के फोटो खीचे गए । फोटो देख कर वैज्ञानिक स्तब्ध रह गए ! परमाणु संयंत्र की छत उड़ गयी थी। धुँए से आकाश में बादल छा गए । अब छुपा कर रखने लायक कुछ शेष न था।  अन्तत: रूस को भी दुर्घटना की बात कबूलनी पड़ी ।



रूस ने दुर्घटना के बाद पूरी कार्यक्षमता दिखायी । चेर्नोबिल में तैनात दमकल कर्मी , इन्जीनियर तथा डॉक्टरों ने जान जोखिम में डाल कर विकिरण की बौछार के बीच अपना फर्ज अदा किया । इनमें से अधिकतर विकिरण जनित बीमारियों के शिकार बने अथवा उनसे मारे गए ।

चेर्नोबिल के पास के कस्बे प्रिप्यात की ४५ हजार आबादी को एक हजार बसों में मात्र तीन घण्टे में हटा दिया गया । इन्हें गृहस्थी का पूरा सामान छोड़ कर जाना पड़ा क्योंकि विकिरण से दूषित हो कर वह मानव उपयोग के लायक नहीं रह गया था ।

 इसके बाद संयंत्र के केन्द्र से ३०० वर्ग मील का इलाका भी खाली करा दिया गया । ९० हजार लोग हटाए गए । इस प्रकार कुल १,३५,००० लोगों को हटा कर बावन नगरों में बसाया गया ।

 यह ३०० वर्ग मील का क्षेत्र मनुष्य के रहने लायक नहीं रह गया । दुर्घटना के बाद के दिनों में इस क्षेत्र में विकिरण सामान्य से ढाई हजार गुना अधिक हो गया था । हजारों एकड़ जमीन , वृक्ष विकिरण से दूषित हो गए ।

 विकिरण हजारों मील दूर फ्रांस व इंग्लैंड तक भी फैला । विकिरण से दूषित साग-सब्जियां , दूध , मछलियां , मांस वगैरह नष्ट करने पड़े । इतना ही नहीं उस समय दूषित चारा अथवा दूषित भूमि पर बाद में उगे चारे को जिन पशुओं ने खाया उनके दूध में भी विकिरण का भारी असर था । योरोप के देशों में ऐसे अन्न आहार पर प्रतिबन्ध लगाया गया ।

चेर्नोबिल रिएक्टर की आग १२ दिन तक काबू में नहीं आई थी। इसके बाद पाँच हजार टन सीमेन्ट , बालू,सीसा , मट्टी , आदि ऊपर से डाल कर उसे पाटा गया । आस पास छोटी बड़ी आग लगी रही तथा हजारों टन सीमेन्ट आदि के नीचे दबा रिएक्तर अंदर अंदर खदबदाता रहा ।

चेर्नोबिल में जो घटित हुआ , वह कहीं भी , कभी भी हो सकता है । चेर्नोबिल के बाद जर्मनी के लोगों की ज़ुबान पर एक नारा चढ़ गया था : चेर्नोबिल इज़ एवरीव्हेयर ! चेर्नोबिल यत तत्र सर्वत्र है ।

परमाणु ऊर्जा से होने वाले नुकसान

गोपा जोशी जी का मूल आलेख यहाँ है - 

 

अमेरिका के साथ एटमी करार का मसला अभी अधर में लटका है। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में हाल के चुनावों में अपनी करार से पहले कांग्रेस कुछ गर्म तेवर दिखाने की कोशिश कर रही थी। मसलन् हरियाणा के झज्जर जिले के झाड़ली गांव में इन्दिरा गांधी बिजली परियोजना की आधारशिला रखने के बाद रैली को सम्बोधित करते हुए सोनिया गांधी ने एटमी करार का विरोध करने वालों को विकास और अमन का दुश्मन बताया। सोनिया गांधी ने आगे जोड़ा कि अमेरिका के साथ एटमी करार का मकसद गांव गांव बिजली पहुचाना है। यह हताशा में की गई टिप्पणी थी। सोनिया गांधी समझ गई थी कि अमेरिका के साथ परमाणु समझौता की कीमत संयुक्त प्रगतिशील सरकार की स्थिरता थी।लेकिन सोनिया गांधी ने हताशा में ही सही एक बड़ा अहम मुद्दा उठा दिया। इस लेख में परमाणु कार्यक्रम सम्बन्धी उपलब्ध तथ्यों की सहायता से यह समझने की कोशिश की जाएगी कि परमाणु ऊर्जा से आम आदमी की खुशहाली में कितना इजाफा होता है ।

परमाणु कार्यक्रम से होने वाले तथाकथित विकास की एक झलक डा. रोजेली बर्टेल,(अध्यक्ष इन्टरनेशनल इन्स्टिट्यूट आफ कनसर्न फार पब्लिक हेंल्थ तथा इन्टरनेशनल परस्पैक्टिव इन पब्लिक हेंल्थ के प्रधान संपादक) द्वारा दिये गए आकड़ों से मिल जाती है।डा. रोजेली बर्टेल का कहना है कि परमाणु हथियारों के परीक्षण से लगभग 1,200 मिलियन लोग यानि 120 करोड़ प्रभावित हुए हैं। 1943 से 2000 तक बिजली उत्पादन से दस करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं। इस दौरान रेडियेशन के सम्पर्क में आने से ही पांच सौ करोड़ बच्चे मरे पैदा हुए हैं। वह आगे जोड़ते है कि परमाणु उद्योग इन आकड़ों को छुपाने की कोशिश करता रहा है ताकि परमाणु शक्ति की वास्तविक कीमत को कम आंका जा सके।

अब जरा परमाणु ऊर्जा से कार्यक्रम से भारत के गांवों का कितना विकास हो सकता है यह भी जान लिया जाए।इसकी एक बानगी डा. संघमित्रा गडकर व सुरेन्द्र गडकर(पी.एच.डी.) के 1991 में राजस्थान के रावलभाटा में किये गए एक सर्वेक्षण की रपट से साफ होजाता है। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य भी रावलभाटा परमाणु ऊर्जा संयत्र का वहां के निवासियों में पड़े प्रभाव का अध्ययन करना था।इस अध्ययन में रावलभाटा के पास के गांवों के लोगों के स्वास्थ्य की स्थिति पर कुछ चौकाने वाले तथ्य सामने आए।इस सर्वेक्षण की रपट अणुमुक्ति (भारत में अपनी किस्म की अकेली पत्रिका) के अप्रेल मई 1993 के अंक में छपी बाद में साइन्स फार डैमोक्रैटिक एक्शन के नवम्बर 2002के अंक में छापी गई।

अणुमुक्ति समूह परमाणु संयंत्रों के विरोध में 1986 की चर्नोबिल की दुर्घटना के बाद कूदा ।इसी दौरान सरकार अणुमुक्ति के कार्यस्थल वड़छी गांव के पास में ही काक्रापार नामक जगह परमाणु संयंत्र लगाने का निर्णय किया। स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया। परन्तु सरकारी दमन के आगे विरोध टिक नही पाया। इस आन्दोलन के दौरान यह भी समझ में आया कि भारत में परमाणु संयंत्रों से स्थानीय निवासियों को होरहे नुकसान को आंकने के लिए कोई विश्वस्त सर्वेक्षण नहीं किया गया था। इसीलिए जनआन्दोलन भी इन संयंत्रों का सिद्दत से विरोध नही कर पारहे थे। अतः सितम्बर 1991 में राजस्थान के रावलभाटा में दस साल पुराने परमाणु संयंत्र के पास रह रहे स्थानीय निवासियों की स्थिति को बारे में जानने का निर्णय लिया गया।हालांकि सर्वेक्षण रपट स्थानीय निवासियों के जीवन के हर पहलू के छूती थी, और सर्वेक्षण के नतीजे बहुत उत्साहबर्धक नही थे। लेकिन स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्थिति बहुत भयावह पाई गई।

कुल 1,023परिवारों का सर्वेक्षण किया गया। इनमें से 571 परिवार रावटभाटा परमाणु बिजली संयत्र से 10 किलोमीटर से कम दूरी पर थे। 472 परिवार इस संयंत्र से 50 किलोमीटि से अधिक दूरी पर स्थित चार गांवों से थे। पास केगावों से 2860 तथा दूर के गावों से 2544 लोगों का सर्वेक्षण किया गया। वैसे इन गांवों को रहन सहन खान पान आदि में काफी समानता थी ऊर्जा संयंत्र की वजह से ही असमानताएं आई थी। सबसे बड़ी असमानता करीब और दूर के गावों के लोगों के स्वास्थ्य के क्षेत्र में दिखी।रावलभाटा के पास के गांवों के अधिकतर(45प्रतिशत) लोगों ने बीमारी की शिकायत की जबकि दूर के गावों के 25 प्रतिशत लोगों ने बीमारी की शिकायत की।पास के 551 गावों में 68 परिवारों में कम से कम एक सदस्य को चार अलग अलग बीमारियों ने घेर रखा था।दूर के 472 गावों में ऐसे घरों की संख्या केवल 9 थी।परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पास के गावों में 30 मरीजों के शरीर में बड़े बड़े ट्यूमर(गांठें) थी। एक महिला की छाती में तो फूटबाल जैसी गोल गांठ थी। कइयों की गाठें टेनिस की बाल के बराबर गोल थी।दूर के गावों में ऐसे पांच केस मिले।पर किसी की भी गांठ फूटबाल जैसी गोल व बड़ी नही थी। गर्भवती स्त्रियों के गर्भपात, समय से पहले जन्म, मरे हुए बच्चों का जन्म ,नवजात शिशुओं की मृत्यु, तथा विकलांगता की दर अधिक पाई गई। संयंत्र के पास के गावों के 44 लोगों को विकलांगता थी। इनमें से पांच की आयु ही 18 साल से ऊपर थी। 33 की आयु 11साल से कम थी तथा 6 की आयु 11 और 18 के बीच थी। दूर के गावों में 14 केस विकलागंता के मिले। इनमें से 4 की उम्र 18 वर्ष से ऊपर थी।6 बच्चे 11से कम उम्र के थे जबकि चार बच्चे 11से 18 के बीच में थे। पास के गावों में 1989 व 1991 के बीच 16 बच्चे विकलागं पैदा हुए, सामान्य बच्चे 236 पैदा हुए। दूर के गावों में इस दौरान 194 सामान्य बच्चे पैदा हुए तीन विकलागं पैदा हुए। इसी दौरान पास के गांवों में चार विकलांग मरे हुए बच्चे पैदा हुएथे जबकि दो सामान्य बच्चे मरे हुए पैदा हुए थे। दूर के गांवों में यह संख्या जीरो थी।नजदीक के गावों में पांच को कई विकलागंताएं थी। इनमें से चार में से हरएक को दो दो विकलागंताएं थी।एक को तीन विकलागंताएं थी।यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि संयंत्र के चालू होने के बाद पास के गावों में पैदा हुए बच्चों में विकलांगों की संख्या बढ़ी थी ।(1981-1991 के बीच पैदा हुए बच्चों में 39 विकलांगता से ग्रस्त थे।)1989-1991के बीच सात नवजात शिशु एक दिन की आयु ही जी पाए। दूर के गांवों में एक शिशु एक ही दिन की अल्पआयु में चल बसा। 1981-91 के बीच 16 विकलांग बच्चे पैदा हुए।6 बच्चे मृत पैदा हुए,27 गर्भपात हुए तथा 31 बच्चे जन्म के बाद जल्दी ही काल के ग्रास बन गए। उल्लेखनीय है कि रावतभाटा भारत का प्रथम ऊर्जा संयंत्र है।कनाडा की मदद से इस संयंत्र का निर्माण 1964 में आरंभ हुआ.1973 में इसको कामर्शियल घोषित कर तिया गया। दूसरी इकाई का काम 1967 में प्रारम्भ हुआ 1981 में कामर्शियल हुआ।

1991 के सर्वेक्षण की रपट के मुख्य निष्कर्षों को हिन्दी में छाप कर रावतभाटा के समीपवर्ती गावों में वितरित किया गया।इसके छः महिने बाद स्थानीय लोगों ने एक जलूस निकाला और रिएक्टरों को बन्द करने की मांग की। एक बूढ़ी आदिवासी महिला अपना पारम्परिक पर्दा त्याग कर मंच पर आई और लोगों को बच्चों में बढ़ती विकलांगता के बावजूद बिजली बनाने की जिद पर अड़े रहने के लिए फटकारा। इस सर्वेक्षण से मिले तथ्यों से साफ होगया है कि रावतभाटा परमाणु ऊर्जा संयंत्र से स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य की स्थिति बिगड़ी और विकलागंता के आकड़ो का अवश्य विकास हुआ। मालूम नही सोनिया गांधी को उपरोक्त सर्वेक्षण की जानकारी था कि नही।यदि नही थी तो आम लोगों को गुमराह करने की कोशिश करने से पहले क्या उन्हें परमाणु ऊर्जा का सच जानने की कोशिश नही करनी चाहिये। यदि आम जनता को परमाणु संयंत्रों से होने वाली त्रासदी की भनक लग जाए तो वे कभी भी अपने निकटवर्ती इलाकों इस प्रकार के संयंत्रों के लगाने का पुरजोर विरोध करेंगे।
इसीलिए पूरे विश्व में सरकारें तथा परमाणु उद्योग परमाणु- परिक्षणों ,परमाणु- हथियारों, परमाणु- ऊर्जा,तथा परमाणु-संयंत्रों के रखरखाव के बारे में लापरवाही और गोपनीयता दोनों ही बरतती है।इससे एक ओर लोगों को इन परिक्षणों, व परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से होने वाले नुकसानों तथा खतरों के बारे में जानकारी नहीं होती है। दूसरी ओर उन्हें दुर्घटना के समय बरती जाने वाली(अ) सावधानियों के बारे में भी कोई ज्ञान नही होता। उचित जानकारी के अभाव में सरकार की जवाबदेही सुनिश्चत करना भी आसान नही होता। चूंकि हर प्रक्रिया गुप्त रखी जाती है इसलिए होचुके या सम्भावित नुकसान की जानकारी भी आम आदमी को नहीं होती। संक्षेप में आम लोगों को तथाकथित विकास का लाभ पहुचे या नही पहुचे पर परमाणु- हथियारों, परमाणु- ऊर्जा उनके बेमौत मारे जाने की सम्भावना बढ़ जाती है। सरकारों का आलम यह है कि वह लीपापोती में ही अधिक लगी रहती हैं ताकि जवाबदेही से बची रहें।

अपने देश में चर्नोबिल दुर्घटना के बाद भी परमाणु संयंत्रों के रखरखाव में किस प्रकार की अ- सावधानी बरती गई इसका एक मिसाल रूपा चिनाय की सनडे आबजरवर 6,9,92 को भेजी एक खबर है। रूपा चिनाय के अनुसार मुम्बई से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भाभा परमाणु शोध केन्द्र में 13 दिसम्बर 1991 को रिऍक्टर में काम कर रहे मजदूरों ने प्रबन्धन को बतायाकि समुद्र और रिऍक्टर के बीच के मैदान में पाइप लाइन फटने से पानी का फब्बारा फूटा था। प्रबन्धन ने आनन् फानन् में छः दिहाड़ी मजदूरों को गड्डा खोदने के काम पर लगा दिया। इन मजदूरों ने बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के व रेडिएशन मापने के बैज पहने जमीन के भीतर आठ फीट गहरा गड्डा खोदा । ताकि फटी हुई पाइप लाइन की मरम्मत की जा सके। शायद इन मजदूरों को बिना किसी सुरक्षा कवच के काम पर लगाने वारा प्रबन्धन भी रेडियेशन से होने वाले खतरे के बारे में अवगत नही था। रेडिएशन स्वास्थ्य जांच विभाग के एक अफसर को रेडियेशन से होने वाले प्रदूषण की आशंका हुई ।उन्हों ने दुर्घटना का पता चलने पर गड्डे के पास इकट्ठा पानी के नमूने लेकर जांच के लिए भेज दिये। तभी इलाके में रेडियोएक्टिविटी से खतरे की सम्भावना पर प्रबन्धन का ध्यान गया। तब भी ठीक से जांच कराने ,प्रभावित लोगों समुचित इलाज करवाने तथा सावधानी बरतने का प्रावधान करने के बजाय सारी घटना में लीपापोती करने की कोशिश की गई। ताकि किसी अफसर को लापरवाही बरतने की वजह से कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही का सामना न करना पड़े। उदाहरण के लिए जिन ठेके के मजदूरों ने करीब आठ घन्टों तक गड्डे में काम किया था उनको फटाफट गड्डे से बाहर निकाल कर नहला धुला कर नए कपड़े पहना कर घर भेज दिया। उसके बाद उन मजदूरों का क्या हुआ किसी को नही मालूम। खोदे हुए गड्डे ,उसके आसपास के क्षेत्र की घासपूस, पक्षियों व कीड़े मकोड़ों में विकिरण पाया गया।सम्भावना है कि पक्षियों और कीड़ों द्वारा यह विकिरण एक जगह से दूसरी जगह फैलाया गया होगा। यही नही ये नाले बरसाती पानी को भी समुद्र तक पहुचाते थे। जिससे यह शक पैदा होता है कि इस नाले से काफी समय से विकिरण समुद्र फैल रहा था। रूपा चिनाय जिन्होंने यह रपट सनडे आबजरवर के 6,9,92 को भेजी का कहना है कि इस प्लान्ट का प्रबन्धन 1978 से ही जानता था कि इस पाइप में रिसाव था। पर उसे न ठीक कराया गया न ही बदला गया।
यहां यह प्रासंगिक है कि भारत ही नहीं अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी परमाणु संयंत्रों से होरहे नुकसान को नजरअन्दाज करने की कोशिश हमेशा से ही होती रही है। डा. रोजेली बर्टेल ने कहा कि चर्नोबिल में अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजन्सी (आइ ए ई ए) का वास्तविक चेहरा सामने आया। (अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजन्सी की स्थापना 1950 में हुई। इसका उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार तथा परमाणु ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना था। ये अपने आप में विरोधाभाषी उद्देश्य हैं। अन्तर्राष्ट्रीय रेडियेशन सुरक्षा आयोग की स्थापना बीसवी सदी के पचासवे दशक में हुई थी। इसका उद्देश्य रेडियेशन के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले कुप्रभावों को जानना व लोगों का इससे बचाव करना है।) डा. रोजेली बर्टेल ने चर्नोबिल दुर्घटना के पीड़ितों के अध्ययन के दौरान यह देख कर हैरान थे कि आई ए ई ए मान रही थी कि इस दुर्घटना में कोवल32 लोगों की जानें गई।जबकि यूक्रेन के स्वास्थ मंत्री ने माना कम 10,000 लोग चर्नोबिल दुर्घटना के कारण मरे । बेलारूस में चर्नोबिल से सबसे अधिक जानी नुकसान हुआ। परन्तु आई ए ई ए व अन्तर्राष्ट्रीय रेडियेशन सुरक्षा आयोग ने इन पीड़ित लोगों की समस्याओं को पूरी तरह से नजरअन्दाज कर दिया। डा. रोजेली बर्टेल का मानना है कि इन दोनों संस्थाओं का विज्ञान से कोई लेना देना नहीं है।

चर्नोबिल दुर्घटना के बाद वहां पर राहत कार्यों में लगाए गए छः लाख लोगों को डां रोजली बर्टल ने जिन्दा लाश कहा है।ये छः लाख लोग रूस के कोने कोने से लाए गए किसान, फैक्टरी मजदूर, खदान मजदूर, सिपाही, व आग बुझाने वाले थे। इनमें से कई को विकिरण वाले धातुओं को नंगे हाथों से उठाना पड़ा था। दुर्घटना के बाद 300 से अधिक जगहों पर लगी आग इनको बुझानी पड़ी। सैकड़ों ट्रक, फायर इन्जिन , कारें आदि इनको जलानी पड़ी। घरों को गिराना पड़ा। एक जंगल को पूरी तरह जमीन पर गाड़ना पड़ा। परमाणु विकीरण से प्रभावित सारा कूड़ा, मिट्टी जमीन पर गाड़नी पड़ी। इन लागों को 180 दिन के लिए कन्सक्रिप्ट किया गया था। लेकिन कईयों से एक साल तक यह काम जबरदस्ती करवाया गया। ना नुकुर करने पर परिजनों को कड़ी से कड़ी सजा देने की चेतावनी दी गई। राहत कार्य पूरा होजाने पर इन लिक्वीडेटरों को दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर कर भुला दिया गया।इनका एक संगठन है जिसका दफ्तर कीव के बाहर स्थित रेडियेशन शोध केन्द्र में है। इस संगठन के अनुसार 1995 तक इस संगठन के तेरह हजार सदस्य मर गए थे इनमें से बीस प्रतिशत ने आत्महत्या की थी। सत्तर हजार सदस्य हमेशा के लिए विकलांग होगए थे। चूंकि सभी लिक्विडेटर इस संस्था के सदस्य नही थे। अतः कइयों के बारे में सूचना जुटाना भी आसान नहीं था। कारण रूस के विघटन के बाद वे अपने अपने देशों के सुदूर इलाकों में बिखरे थे।

यहां यह तथ्य ध्यान में रखना आवश्यक है कि चर्नोबल न पहली दुर्घटना थी न आखरी। 1991 में तथ्यों को स्वयं बोलने दो (Let the Facts Speak)शीर्षक पुस्तक छपी।इसमें 1990 तक हुए परमाणु दुर्घटनाओं का लेखाजोखा है। 15 साल बाद इसका तीसरा संसकरण छपा।इसमें इस बात पर चिन्ता व्यक्त की गई कि 60 साल के दुर्घटनाओं से भरे इतिहास के बावजूद परमाणु ऊर्जा को बहुत नई, साफ सुथरी, सस्ती, पर्यावरण के लिए सुरक्षित, विश्वसनीय बताया जारहा था। इस पुस्तक में तथ्यों की सहायता से सिद्ध किया गया है कि परमाणु ऊर्जा का हर कदम—खनन से मिलिगं, इन् रिचमन्ट, रिएक्टर चलाने,तथा परमाणु कचरा ठिकाने लगाने तक सुरक्षित नही है।
मसलन् परमाणु कचरा नष्ट नही होता।.कुछ कचरा जैसे Plutonium करीब 250,000 साल तक विकिरण फैलाता है। दूसरा, विकिरण की बहुत थोड़ी मात्रा भी बहुत बड़ा नुकसान पहुचाती है। मसलन् 1987 में गोआना ब्राजील में कैन्सर थैरैपी मशीन से सीसियम (cesium) का एक फ्लास्क कबाडी को बेच दिया गया। लोगों ने इससे कोई पाउडर झरता देखा और दवा समझ कर शरीर पर मल लिया। कुछ समय बाद रेडियम से उनका शरीर जलने लगा तो उन्हों ने पानी से धो डाला इससे घरों का पानी व सीवर दोनों प्रदूषित हो गये। पास पड़ोसी इस प्रदूषण की चपेट में आने लगे.।इन प्रदूषित लोगों को हस्पताल ले जाने वाली ऐम्बुलैंस भी प्रदूषित होगई। इन वाहनों को प्रदूषण रहित करने की किसी को नही सूझी। 112,000लोगों को पकड़ कर जांच के लिए स्थानीय स्टेडियम में लाया गया। जांच में 249 में भारी मात्रा नें रेडियम जहर मिला। पांच लोग इस जहर से मर गए।उनको खास प्रकार के ताबूतों में विशेष तरीके से बनाई गई कब्रों में दफनाया गया।ताकि मुर्दों से प्रदूषण न फैले। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषित स्टेडियम , सीवर, व अन्य सुविधाएं लम्बे समय (कई जन्मों )तक खतरनाक रहेंगी।

इस पुस्तक में बताया गया है कि परमाणु ऊर्जा उद्योग अन्य उद्योगों से इस मायने में भिन्न है कि यह परमाणु हथियारों के उत्पादन के उद्योगों से तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। इस कारण इस उद्योग में बहुत गोपनीयता बरती जाती है तथा जनता को इनसे होने वाले नुकसान (दुर्घटनाओं से तथा प्रदूषण से) के बारे में अक्सर गलत सूचना दी जाती है। इन उद्योगों की जबाबदेही भी अन्य उद्योगों से कम होती है। परिणामस्वरूप अन्य उद्योगों की तुलना में परमाणु उद्योगों से खतरे अधिक होने के बावजूद सुरक्षा मापदन्ड कमजोर होते हैं। इस सब का खमिजाना सभी जीवित प्राणियों को भरना पड़ता है। इस खमिजाने की एक संक्षिप्त तसवीर इस प्रकार है।
11 जनवरी 1980 AAP-AP, ने बताया कि 1950 मेंउत्तरपूर्वी आस्टेलिया की एक युरेनियम खान के बांध की मिट्टी की दीवार तेज बारिष की वजह से टूट गई और रेडियोऐक् ‘टिव से आस पास के पानीके स्त्रोत प्रदूषित होगए। इस प्रदूषण को बारे में 1980 तक गोपनीयता बरती जारही थी। यह खान इग्लेंन्ड,व अमेरिका के परमाणु हथियार प्रोग्राम से जुड़ी कम्पनी ने ली थी तथा यहां सुरक्षा के मापदन्ड बहुत कमजोर थे।

The West Australian” –ने 3 जनवरी 1981को छापा कि एक सेवानिवृत नौसेना के पाइलट ने बताया कि उसने अक्तूबर 1947 में तीन फ्लाइट्स से अटलान्टिक समुद्रतट पर परमाणु कचरा डाला लेफ्टीनेंन्ट कमान्डर ने अखबार को बताया कि वे यह जानकारी मीडिया को इसलिए देरहे थे कि उन्हें डर था कि अमेरिकी सरकार परमाणु कचरे से भरे कनिस्टरों से कचरा रिसने को को गंभीरता से नही लेरही थी ।
14,9 , 1954,में रूस के. Tu-4 बम्बरों ने 40,000 टन परमाणु हथियार एक परमाणु परिक्षण के लिए गिराए । इससे 45,000 रूसी सेनिकों को परमाणु विकिरण का खतरे से दो चार कराया गया। Tu-4 बम्बरों को उड़ाने वाले पाइ लट को ल्युकेमिया हुआ उसके साथी को केंन्सर हुआ। इस परीक्षण के बाद हजारों लोग मरे।

1952, 12th December को कनाडा में पहली बड़ी रिएक्टर दुर्घटना मानवीय गलती की वजह से हुई।
“Daily News” ने 6जून 1980 को लिखा कि अरिजोना ,स.रा . अमेरिका(AriZonA, U.s.A).में युरेनियम खान मजदूरों में radon daughter की वजह से मृत्यु दर काफी ज्यादा है।1978 में मरे 200 लोगों में 160 बे मौत मरे। नवाजो यूरेनियम खान मजदूरों को फेफड़ों के कैन्सर का खतरा कम से कम 85 गुना अधिक है।ये खान मजदूर स्थानीय आदिवासी हैं खनन करने वाली कम्पनियों ने इन स्थानीय लोगों से तेल निकालने के नाम पर झूठ बोलकर जमीन लीज पर ली। इस प्रकार उन्हें मालूम ही नही है कि वे मौत से खेल रहे हैं।जमीन के खनन् से उस क्षेत्र का भू जल भी प्रदूषित होगया है।

1979, अक्तूबर में थ्री माइल आइलैंन्ड पनसिलवानिया, स. रा.अमेरिका में हुई दुर्घटना की वजह से परमाणु प्लान्ट पर $150,000 का जुर्माना लगाया। यह दुर्घटना परमाणु कम्पनी के सुरक्षा के मापदन्डों की कम से कम 17 जगहों उपेक्षा करने से हुई। एक रिपोर्ट के अनुसार 1979 की इस दुर्घटना में 20 प्रतिशत परमाणु ऊर्जा संयंत्र गल गया था। अरिजोना के गवर्नर ब्रूस बेब्बिट ने राज्य में आपात काल लागू कर दिया।इस दुर्घटना में $300,000 मूल्य का भोजन भी प्रदूषित हुआ।

पुस्तक में बताया गया है कि लापरवाही के अलावा वैज्ञानिकों की अज्ञानता भी खतरे को बढ़ाती है।वैज्ञानिकों को थोड़ी थोड़ी मात्रा में लम्बे समय तक ग्रहण किये गए रेडियेशन क दुष्परिणामों के बारे में सीमित जानकारी है।मानव शरीर में इससे क्या कैमिकल व मोलिकुलर परवर्तन आसकते हैं यह भी नहीं मालूम। जैसे जैसे वैज्ञानिक ज्ञान इस दिशा में बढ़ रहा है परमाणु उद्यागों में वैसे वैसे मजदूरों को मिलने वाले रेडियेशन की सुरक्षित सीमा घटाई जारही है।रेडियेशन का आज सबसे बड़ा खतरा आने वाली पीड़ियों को है कारण जीन्स के डैमेज हो जाने से विकलागं बच्चे बड़ी सख्या में पैदा होरहे हैं।

5नवम्बर 1979 के द आस्ट्रेलियन ने छापा कि जापान में ताकाहामा 11रिएक्टर (फूक्वे के पास) से मानवीय लापरवाही की वजह से 80 टन रेडियोएक्टिव पानी रिस गया।यह दुर्घटना जापान की सबसे गम्भीर दुर्घटना मानी जाती है। एक प्रवक्ता के अनुसार यह दुर्घटना ने सबको आश्चर्य में डाल दिया।इसके कारणों का पक्का पता नही था। प्रवक्ता के अनुसार शायद तापमान मापने वाली पाइप की बनावट में कोई कमी रह गई होगी या तापमान मापने वाली पाइप का ढ़क्कन गलती से खुल गया होगा। प्लान्ट के चार तापमान मापने वाली पाइपों में से एक का ढ़क्कन खुल कर गिर गया और पाइप से पानी तेजी से बाहर निकल आया। इसके बाद रिएक्टर को एक महिने के लिए बन्द करना पड़ा

परमाणु संयंत्रों के रखरखाव में कितनी लापरवाही बरती जाती है इसका अंदाजा अमेरिकी न्यूक्लियर रेगुलेटरी कमिशन के मिशिगन पावर कम्पनी पर $402,750,का जुर्माना थोपने के प्रस्ताव से साफ होजाता है। यह राशि आज तक अमेरिका में थोपी गई जुर्माना की राशि में सबसे बड़ी है। जुर्माने का कारण कम्पनी का रिएक्टर कनटेन्मेंन्ट भवन से जोड़ने वाली पाइप का वाल्व बन्द करना भूल जाना था।किसी भी गम्भीर दुर्घटना के समय इस भवन का उपयोग परमाणु विकीरण को बाहर निकलने देने से रोकने के लिए होता है।चूंकि वाल्व अप्रेल 1978 से सितम्बर 1979 तक खुला रहा । इस दौरान यदि कोई दुर्घटना होती तो परिणाम भयावह होते।

सितम्बर 1980 में जापान के एक प्रतिनिधि ने न्यूक्लियर फ्री पैसिफिक फोरम आस्ट्रेलिया को बताया कि जापान के 21 परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में 6,280,000 से अधिक मजदूर रेडियेशन की खतरनाक सीमा तक ऐक्सपोज होते हैं। एक अन्य प्रतिनिधि जो पेशे से डाक्टर था तथा जो हिरोसीमा में अमेरिकी बम्बारी के बावजूद बच गया था ने कहा कि हिरोसीमा नागासाकी में मरे लोगों की संख्या अमेरिका द्वारा आंकी संख्या से कहीं अधिक थी। डा. शुनतारो के अनुसार बम्बारी के एक साल के भीतर 160,000 निवासी काल का ग्रास बने जबकि अमेरिका ने यह संख्या 60,000 आंकी थी।नागासाकी में अमेरिकी अनुमान 28,000के विपरीत 70,000 लोगों ने अपनी जान गवाई।.

उपरोक्त दुर्घटनाएं महज कुछ उदाहरण हैं ।उल्लेखनीय है कि विभिन्न देशों में हुई दुर्घटनाओं का जो ब्योरा मिलका है वह परमाणु ऊर्जा को लोक- अहितकारी,और विनाशकारी सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। इसके अलावा अमेरिका जिसके साथ करार करने अपनी चुनी हुई सरकार आतुर है वहां की सरकार भी परमाणु परीक्षणों से वहां के जन स्वास्थय पड़ने वाले कुप्रभाव को नजरअंदार करती है। डा. बैनजामिन स्पोक ने किलिगं अवर ओन क्रोनिक्लिगं द डिजास्टर आफ अमेरिकाज एक्सपीरिएन्स विथ एटोमिक रेडिएशन, 1945-1982( Chronicling the Disaster of America’s Experience with Atomic Radiation, 1945-1982 Harvey Wasserman & Norman Solomon with Robert Alvarez & Eleanor Walters) नामक पुस्तक की अपनी भूमिका में लिखा है कि अमेरिकी संघीय सरकार परमाणु तकनीक के विकास सम्बन्धी सभी मूलभूत मंत्रणाओं को गुप्त रखती है।इससे न तो इन कार्यक्रमों की सामाजिक कीमत आंकनी आसान होती है और न ही मानवीय स्वास्थ्य की कीमत पर कोई सार्वजनिक बहस मुबाहिसा होसकती है और न ही कोई जनचेतना जगाने के कार्यक्रम लिए जासकते हैं। यही नही संघीय सरकार परमाणु संयंत्रों की वजह से लोगों द्वारा भुगते हुए स्वास्थ सम्बन्धी समस्याओं को भी सिरे से इनकार कर देती है।इस पुस्तक के लेखकों की एक पूरी टीम है इस टीम के सदस्यों ने बम परीक्षण व बम विस्फोट की वजह से उत्पन्न हुए परमाणु विकीरण के कुप्रभावों के भुग्तभोगी सैनिकों, व नागरिकों से लम्बी बातचीत की।उन मजदूरों से भी जिन्होंने अपने काम के हिस्से के रूप में रेडियोएक्टिव इसोटोप्स पर और अन्य सामग्री पर काम किया बातचीत की।इसके अलावा उन वासिन्दों से भी बात की जो परमाणु बम परीक्षण क्षेत्र,रिएक्टर लगाए गए स्थान से, या यूरेनेयम उत्खनन्, मिलिंग व इनरिचमैंन्ट, परमाणु कूड़ा रखे गए स्थानों से नीचे की ओर रहते थे।

भुग्तभोगियों के अलावा सरकारी दस्तावेज-1974 से पहले परमाणु ऊर्जा आयोग की 1974 के बाद इसेक उत्तराधिकारी न्यूक्लियर रेगुलेटरी कमिशन की बन्द दरवाजों के पीछे हुई बैठकों के मिनट्स, और इनर्जी रिसर्च एण्ड डैवलपमैंन्ट एजन्सी व इसका नया अवतार डिपार्टमैंन्ट आफ इनर्जी के दस्तावेज भी इकट्ठे किये।

इन सबके आधार पर अपनी भूमिका में डा. बैनजामिन स्पोक ने लिखा कि हमारी सरकार परमाणु हथियारों तथा परमाणु ऊर्जा के लिए इतनी द्रढ़ संकल्प है कि वह इन कार्यक्रमों से होने वाले नुकसान के बारे में जो भी साक्ष्य सामने आएंगे उनको सिरे से नकार देती है। सत्य को झुठला देती है, लोगों को गुमराह करती है, जन स्वास्थ्य यहां तक कि आम लोगों की जान को भी दाव पर लगा देती है। जो वैज्ञानिक सरकार की नीतियों से असहमति जताते हैं उनका चरित्र हनन करने की कोशिश करती है। डा. स्पोक सबसे अधिक चिन्तित बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर दिखे। रेडियेशन के सम्पर्क में आने से बच्चों को केंन्सर व ल्युकेमियां जैसे रोगों की सम्भावना बढ़ जाती है । साथ ही बच्चों में जन्म से ही शारीरिक और मानसिक विकलांगता होने की सम्भावना बढ़ जाती है। पैदाइशी विकलांगता के ये जीन्स अगली पीढ़िया उत्तराधिकार में पाती हैं। डा. अर्नस्ट स्टर्नग्लास व सिक्रेट फालआउट , लो लिवल रेडियेशन फ्राम हिरोशिमा टु थ्री माइल आइलैंड में लिखते है कि बहुत थोड़ी मात्रा में रेडियोएक्टिव विकीरण के रिसाव से (चाहे वह किसी भी कारण से हो )जान को खतरा बढ़ जाता है तथा जन्म से विकलांगता व जान लेवा बीमारियों की घटनाएं बढ़ जाती हैं।

परमाणु कार्यक्रम के खतरों के बारे में अमेरिका की सरकारों के झूठ व फरेब को उजागर करते हुए लिखा हैं कि थ्री माइल आइलैंड दुर्घटना के एक दिन बाद किसी ने फिज्यौलौजी एण्ड मैडिशन में नोबल पुरस्कार से सम्मानित डा. जार्ज वाल्ड से पूछा कि जनता को इस दुर्घटना के प्रभावों के बारे में यूटिलिटी के प्रवक्ता के आश्वासनों पर विश्वास करना चाहिये या उनके स्वयं के खतरों के मूल्यांकन पर। डा. वाल्ड ने उत्तर दिया कि हमें स्वयं से पूछना चाहिये कि किस का हित खतरों को कम बताने में सधता है परमाणु उद्योग का या उस स्वतंत्र वैज्ञानिक का जो जनता को खतरों से आगाह कर रहा है। उल्लेखनीय है कि उद्योग के प्रवक्ता ने जनता को आश्वस्त कर दिया था कि घबराने की कोई बात नही है।डा. वाल्ड ने आगे जोड़ा कि वर्तमान परिस्थियों में वे स्वयं परमाणु उद्योग के प्रवक्ता की बातों पर ज्यादा विश्वास नही करेंगे।
आज अपने देश अपनी जनता द्वारा चुनी हुई सरकार और विपक्ष दोनों ही परमाणु ऊर्जा उत्पादन से आम आदमी पर मडरा रहे खतरे के बारे में चिन्तित नही दिखते। ये सरकारें जनता द्वारा चुनी अवश्य गई है परन्तु इनका नीतियां दर्शाती हैं कि ये इस देश की सम्पदा को व्यापारिक घरानों तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बिना किसी लाग लपेट के बेचने में लगी हैं।इनको न जनहित की चिन्ता है न इस देश को जो थोड़ी बहुत आजादी हासिल है उसको बचाए रखने की। ऐसे में आम आदमी को अपनी चिन्ता स्वयं करनी है ऐसी विनाशकारी योजनाओं का पुरजोर विरोध करना चाहिए। आज वामपंथी दलों के दबाव में भारत अमेरिकी परमाणु करार कुछ समय के लिए टल अवश्य गया है। पर परमाणु ऊर्जा के विकास की सम्भावनाएं बनी हुई हैं.। कारण किसी को परमाणु ऊर्जा के उपरोक्त खतरों से सरोकार नही है। तथाकथित विकास के नाम पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विकास का रास्ता खोला जारहा

अणु लोक जागृति: गीत और नारे

नारायण भाई देसाई द्वारा लिखे गए ये कुछ गीत और नारे, जो अणुमुक्ति के अभियानों के दौरान लोकप्रिय हुए:

बोलो किससे पूछा, किससे पूछा रे  !

तुमसे पूछा, हमसे पूछा,
बोलो इससे पूछा, उससे पूछा,
                                 किससे पूछा?
तुमको तो है बिजली की माया
हम पर तो है मौत की छाया |
ऐसा, ऐसा भी क्या तुमने सोचा?
                                 किससे पूछा?
सेवक तुम हमरे कहलाते
हमारी राय कभी ना लेते
प्रजा का तंत्र रहेगा ओछा
                                 किससे पूछा?
हमको है रोजी की भूल
तुमको रंगरेली का शौक
भूखों मरेगा क्यों देश समूचा,
                                 किससे पूछा?



सुनो सुनो रे अणुबिजली  तो है खतरे से खाली नहीं !!


शुरू से लेकर आखिर तक तो यह विकिरण फैलाती है |
जल, स्थल, वायु, नभ को भी वह विष की घूँट पिलाती है |

यंत्रों की गड़बड़ से अब तक दुर्घटनाएं हुईइन कईं |
कुदरत के प्रकोप से बचना संभव है सदीव नहीं |
कभी मानव से चूक न हो इसी स्थिति होनेवाली कहीं?
सुनो सुनो रे अणुबिजली तो है खतरे से खाली नहीं ||

तस्कर चोरों ने तो अब तक कच्चा माल चुराया है |
तोड़फोड़ और लूटपाट का खतरा यहाँ समाया है |
और अगर हो युद्ध कभी तो बनाती सहज निशाँ यही |
शत्रु के हाथों में अणु बम हो जाएगा भान नहीं?

उसके लिए उपहार ला रही चांदी की थाली में वही
सुनो सुनो रे अणुबिजली तो है खतरे से खाली नहीं ||


छिड़ा आज संघर्ष जगत में जीवन और मरण का
खडा मरण के सम्मुखीन हो दल है नवजीवन का |

भूमि पर अधिकार जमा कर, आता को निज दासी बनाकर.
रहें चूसते उसको जी भर, उन्हें चैन नहीं क्षण का
श्रम, संतोष व मेलजोल में सुख है सहजीवन का |
छिड़ा आज संघर्ष जगत में जीवन और मरण का ||

जीवन का संगीत आज है गूंजा मीठे स्वर से,
वन-वन की गहरी छाया से, सरिता के मर्मर से |
बाँध बाँध कर बहते जल को, काट काट कर घर जंगल को
सिस्थापित कर तोड़े दिल को, लानत उस पर बरसे ||

जो प्रकृति से प्रीति रखते उन पर निसर्ग हरसे
जीवन का संगीत आज है गूंजा मीठे स्वर से |
जीवन के इस भव्य घोष में आशा का सन्देश
तभी बचोगे अगर बचेगा प्रकृति का परिवेश ||

भूमि का तुम क्षरण मिटाओ, अणु विकिरण जड़मूल हटाओ
विलासिता को शीघ्र भगाओ, मिट जाएंगे द्वेष



अणुमुक्ति के कुछ नारे - 

  • नरबली का नया प्रकार, अणु कारखाना काकरापार 
  • तब तक न हो खुशहाली, ऊर्जा की जब तक बर्बादी |
  • जानलेवा अणु कचरा - कैसी धरोहर?
  • विकिरण जहरी सांप है, अणु ऊर्जा अभिशाप है