Showing posts with label परमाणु ऊर्जा. Show all posts
Showing posts with label परमाणु ऊर्जा. Show all posts

रावतभाटा में परमाणु बिजलीघरों के खिलाफ 10,000 लोगों ने कूच किया

कोटा के पास रावतभाटा में 15 जून 2012 को 10,000 लोगो ने परमाणु बिजलीघरों के खिलाफ एवं स्थानीय विकास की मांग को लेकर कूच किया. चार किलोमीटर के बाद उनको रोक दिया गया. वहां पर सभा हुई. इसका आयोजन 'जन संघर्ष समिति' ने किया था जिसमे 'परमाणु प्रदुषण संघर्ष समिति' एवं अन्य लोग शामिल थे. सभी दलों का समर्थन था. कोटा के दो भाजपा विधायक भी शामिल थे.
परमाणु प्रदूषण संघर्ष समिति पिछले काफी समय से आवाज उठा रही है. कुछ महीने पहले एक काफी लम्बी मानव श्रंखला बनाई गई थी, जिसमे करीब दो हजार लोग शरीक हुए थे.
प्रमुख मांगे इस प्रकार हैं---
---- इकाई 7-- 8 का निर्माण बंद किया जाए.
---- प्रस्तावित परमाणु इंधन कोम्प्लेक्स को न बनाया जाये.
--- क्षेत्र में 2 लेन पक्की सडको का जाल बिछाया जाये ताकि दुर्घटना के समय तेजी से लोगों को हटाया जाये.
--- स्थानीय लोगो के नियमित स्वास्थ्य परिक्षण और इलाज की समुचित व्यवस्था की जाय.
--- किसानो के लिए सिंचाई की व्यवस्था की जाए.
--- स्थानीय युवकों को प्राथमिकता से रोजगार प्रदान किया जाए.
--- राणाप्रताप सागर अभयारण्य में शामिल किया जा रहे 35 गाँव को बाहर रखा जाए.
   आदि.
    इस कार्यक्रम का परचा और विडियो सलंग्न है.


जैतापुर: फुकुशिमा के सबक सीखने से इन्कार


(1)
28 मार्च 1979 को अमेरिका के पेनसिल्वानिया इलाके में थ्री माइल आइलैण्ड में परमाणु हादसा हुआ। बीस मील के दायरे में रहने वाली करीब 6 लाख आबादी की से इलाका खाली करवाया गया। हादसे में हुई मौतों पर कोई अधिकृत विश्वसनीय बयान भले न दिया गया हो लेकिन परमाणु संयंत्र के नजदीक रहने वाली आबादी में अनेक खतरनाक बीमारियों के बढ़ने की अनेक गैर सरकारी रिपोर्टें आयी हैं। परमाणु विकिरण युक्त 40 हजार गैलन पानी को नजदीकी नदी में छोड़ देने पर अमेरिकी प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों की जनता में खूब थू-थू हुई। अमेरिका भी परमाणु सुरक्षा के मामले में अपनी अचूक व्यवस्था का भरपूर दम भरता था। थ्री माइल आइलैण्ड के परमाणु हादसे के बाद अमेरिका ने अपने मुल्क में कोई नया परमाणु संयंत्र नहीं लगाया।

(2)
चेर्नोबिल हादसे को इस वर्ष की 26 अप्रैल को 25 वर्ष हो गए। तत्कालीन सोवियत संघ के उक्रेनियन गणराज्य में हुए उस हादसे में कितने लोग मारे गए, इसके आँकड़े आश्चर्यजनक हद तक विरोधाभासी हैं। कुछ सूत्र चेर्नोबिल के हादसे से मात्र 31 लोगों की मौत हुई मानते हैं, कुछ तीन से चार हजार और कुछ के मुताबिक चेर्नोबिल से हुए रेडिएशन की वजह से 1986 से 2004 के बीच 9 लाख से ज्यादा लोग मारे गए। रेडिएशन से प्रभावित करीब सवा लाख हेक्टेयर जमीन को हादसे के बाद से अब तक, और आगे भी न जाने कितने वर्षों तक के लिए किसी भी तरह की जैव उपस्थिति के लिए खतरनाक घोषित कर दिया है।
चेर्नोबिल दुनिया के अति सुरक्षित कहे जाने वाले परमाणु संयंत्रों में से एक था। सोवियत संघ की आपातकालीन सुरक्षा का आलम ये था कि संयंत्र के पास मौजूद समूचे प्रिपयात शहर की आबादी को उन्होंने महज कुछ ही घंटों के भीतर खाली करवा लिया था।

(3)
और सन् 2011 की 11 मार्च को जापान में सूनामी और भूकंपों की तबाही झेल रहे जापान को फुकुशिमा परमाणु संयंत्र में दुर्घटना का कहर झेलना पड़ा। जापान में इसका इंसानों के जीवन और स्वास्थ्य पर कितना असर हुआ है, ये तथ्य तो अभी बाहर नहीं आये हैं। जो जानें गयीं, उनमें कितनों के लिए भूकंप को, कितनों के लिए सूनामी को और कितनों के लिए परमाणु हादसे को जिम्मेदार माना जा सकता है, ये एक अलग ही कवायद है। लेकिन इतना तो स्थापित हो ही गया कि जापान, जो धरती और समंदर की करवटों और मिजाज को बहुत अच्छे से जानता है और जिसकी सुरक्षा व्यवस्था भी विश्व के अन्य विकसित देशों से कम नहीं थी, वो भी अपने परमाणु संयंत्र को दुर्घटना से नहीं बचा सका।
......
अमेरिका, सोवियत संघ और जापान - तीनों ही देश तकनीकी और विज्ञान के मामले में दुनिया के अग्रणी और अत्यंत सक्षम देशों में से हैं। तीनों ही देशों में श्रेष्ठ तकनीकी, श्रेष्ठ वैज्ञानिक और राज्य की पूरी मशीनरी का साथ होने के बावजूद परमाणु संयंत्रों में दुर्घटनाओं को टाला नहीं जा सका।
अन्य देशों की प्रतिक्रियाएँ और फ्रांस की फुकुशिमा के हादसे के बाद तो पोलैण्ड, इटली, स्विट्जरलैण्ड, जर्मनी सहित दुनिया के अनेक देशों ने अपने देशों में प्रस्तावित परमाणु परियोजनाओं को स्थगित कर दिया है। अकेले योरप में ही सब मिलाकर करीब 150 रिएक्टर हैं जिनमें से आधे बिजली बनाने के काम में आते हैं। स्विट्जरलैण्ड ने अपने उन पाँच रिएक्टरों को बदलकर नये रिएक्टर लगाने का निर्णय रोक लिया है जिनकी उम्र पूरी हो गई थी। इटली चेर्नोबिल हादसे के बाद से ही परमाणु ऊर्जा से तौबा किये बैठा है। उसने अपना आखिरी परमाणु रिएक्टर भी 1990 में बंद कर दिया था। हालाँकि अपनी ऊर्जा जरूरतों का 10 प्रतिशत अभी भी वो परमाणु ऊर्जा से पूरा करता है लेकिन वो ऊर्जा वो खुद न पैदा करके आयात करता है। वैसे इटली भी वापस परमाणु ऊर्जा के उत्पादन के बारे में पुनर्विचार कर ही रहा था लेकिन जापान के हादसे ने उन विचारों को भी स्थगित कर दिया। योरप में आॅस्ट्रिया परमाणु ऊर्जा से पूरी तरह मुक्त देश है लेकिन इससे वो सुरक्षित होने का भ्रम नहीं पाल सकता। आस-पड़ोस के देशों के परमाणु संयंत्रों में होने वाली दुर्घटना का असर वहाँ पड़ेगा ही पड़ेगा। इसलिए आॅस्ट्रिया सभी देशों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है कि वो परमाणु ऊर्जा के विकल्प की तलाश करें न कि परमाणु ऊर्जा के विनाशकारी स्वरूप को कम करके आँकने की।

हाँ, फ्रांस की प्रतिक्रिया जरूर इन सब की तुलना में अधिक ढुलमुल रही। फ्रांस, दरअसल परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अमेरिका के बाद षिखर पर दूसरे सर्वोच्च स्थान पर है। उसके पास 19 परमाणु संयंत्र हैं जिनमें 58 रिएक्टर काम करते हैं और उनसे फ्रांस की करीब 80 प्रतिशत ऊर्जा पैदा होती है। इस रास्ते पर सरपट दौड़ रहे फ्रांस के साथ ऐसा नहीं है कि वहाँ कभी कोई परमाणु दुर्घटना न घटी हो। स्तर 4 की दो बड़ी परमाणु दुर्घटनाएँ वहाँ 1969 और 1980 में घट चुकी हैं। उनके अलावा भी 2008 में एक ही हफ्ते में दो बार अरेवा के ही परमाणु संयंत्रों में यूरेनियम रिसाव की दुर्घटनाएँ हुईं। एक बार तो यूरेनियम टब से निकलकर भूजल में जाकर मिल गया और दूसरी बार पाइप फटने से यूरेनियम रिसाव हुआ। जाँच अधिकारियों ने पाया कि पाइप बरसों पुराना था और उसका लगाा रहना लापरवाही का नतीजा था। अरेवा के अधिकारियों ने माना कि गलती पकड़े जाने से पहले तक उससे 120 से 750 ग्राम यूरेनियम का रिसाव हो चुका होगा। इसी तरह दूसरे मामले में यूरेनियम का रिसाव हुआ और वो पास की दो नदियों और भूजल में जाकर मिल गया। परमाणु सुरक्षा विशेषज्ञों ने तत्काल दोनों नदियों और आसपास के कुओं के पानी का उपयोग बंद करवाया। खेतों में पौधों को पानी देना भी बंद कर दिया गया। खुद अरेवा कंपनी ने इस दुर्घटना को गंभीर मानते हुए अपने प्लांट डाइरेक्टर को नौकरी से हटा दिया लेकिन आधिकारिक तौर पर उसने इसे स्तर 1 की परमाणु दुर्घटना मानने पर जोर दिया और कहा कि इससे किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचा। हालाँकि दुर्घटना के स्तर का सही संदर्भ यह जानने पर बनता है कि स्तर 1 की दुर्घटनाएँ फ्रांस में 2006 में 114 हुई थीं और 2007 में 86।

परमाणु संयंत्र बनाने, यूरेनियम उत्खनन करने, परमाणु कचरे को ठिकाने लगााने आदि में वहाँ की अरेवा कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है। अरेवा कंपनी की मालिक फ्रांस की सरकार है। भारत में पिछले दिनों आये फ्रांस के राष्ट्रपति ने घूमने-फिरने, हाथ मिलाने, राजनयिक भोजन करने के अलावा जो एक काम पूरी मुस्तैदी से किया था, वो था अरेवा कंपनी द्वारा महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में जैतापुर परमाणु संयंत्र के लिए परमाणु रिएक्टर अरेवा की ओर से तैयार करने का करार। बेशक तब तक फुकुशिमा नहीं हुआ था, लेकिन चार साल से जैतापुर क्षेत्र के लोग तो उस परमाणु परियोजना का विरोध कर ही रहे थे। विरोध और भी स्तरों पर जारी था। दिल्ली में हस्ताक्षर अभियान चला, वामपंथी सांसदों ने मामला उठाया। एक स्वतंत्र दल ने वहाँ के लोगों से मिलकर और परियोजना के तकनीकी पहलुओं को लेकर एक रिपोर्ट जनता के बीच प्रसारित की। फिर फुकुशिमा हुआ। भारत सरकार ने जापान के लिए संवेदनाएँ इत्यादि प्रकट करने के बाद कहा कि जैतापुर परमाणु संयंत्र किसी भी हालत में नहीं रुकेगा।

जैतापुर में विरोध क्यों?

फुकुशिमा के हादसे के बाद भी भारत सरकार जैतापुर में 10000 मेगावाट क्षमता वाला परमाणु संयंत्र लगाने के निर्णय पर पुनर्विचार करने को भी तैयार नहीं है। एक ही स्थान पर स्थापित होने वाला ये दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु संयंत्र होगा। जल्दबाजी में, बगैर जरूरी जानकारियों को इकट्ठा और विश्लेषित किये ये परमाणु ऊर्जा संयंत्र वहाँ के ग्रामीण निवासियों पर थोप दिया गया है। पहले तो स्थानीय लोगों को कुछ हजार रुपये प्रति एकड़ का मुआवजा लेकर टरकाना चाहा लेकिन जब स्थानीय लोगों ने जमीन छोड़ने से इन्कार किया तो मुआवजे की राशि बढ़ाकर पिछले साल 4.5 लाख रुपये और बाद में 10 लाख रुपये प्रति एकड़ तक बढ़ा दी गयी, लेकिन प्रभावितों में से इक्का-दुक्का लोगों को छोड़ किसी ने मुआवजा नही लिया। दूसरी तरफ अधिकारी ये दोहराते रहे कि वो जमीन तो बंजर है, खाली पड़ी है और 50-60 प्रतिशत जमीन का तो कोई दावेदार भी नहीं है, इसलिए परियोजना निर्माण में कोई बाधा नहीं है। सरकार की एक एजेंसी द्वारा किये गए एक अध्ययन के बाद कहा गया कि वहाँ मछुआरों का कोई गाँव ही नहीं है जबकि जब विरोध करने वाले लोगों पर पुलिस दमन हुआ तो वो मछुआरों के गाँव सखरी नाटे में ही हुआ, जो आदमी मारा गया, वो भी मछुआरा ही था।

परियोजना से प्रभावित होने वाले सभी गाँवों की ग्राम पंचायतों ने बाकायदा प्रस्ताव पारित करके परियोजना का विरोध किया है और वहाँ के लोग पिछले पाँच बरसों से अहिंसक और लोकतांत्रिक तरीकों से इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। कुछ परिवारों को छोड़कर बाकी लगभग सभी परिवारों ने सरकार द्वारा दिये जा रहे मुआवजे को नहीं लिया है फिर भी राष्ट्रीय हित का बहाना लेकर सरकार ने उनकी जमीनों पर भूमि अधिग्रहण कानून के अनुच्छेद 17 का इस्तेमाल करके आपातकाल प्रावधान के तहत परियोजना के लिए लोगों की 953 हेक्टेयर कब्जा कर लिया है। लेकिन लोगों के विरोध और उनके सवालों का जवाब देने के बजाय सरकार अपने तय रास्ते पर आगे बढ़ रही है। इस परियोजना के पहले जो अध्ययन होने चाहिए थे, वो पूरे होने के पहले, और आसपास के जनजीवन, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों पर परमाणु ऊर्जा के होने वाले असरों को जाँचने के पहले ही जमीन का अधिग्रहण कर लिया गया। इसमें उन लोगों का कोई ध्यान भी नहीं रखा गया जो जमीनों के मालिक भले न हों तो भी जिनका जीवन मुख्य रूप से मछलीपालन जैसी समुद्र से जुड़ी हुई गतिविधियों पर निर्भर रहता है। बेशक परियोजना के स्थानीय विरोध की वजह लोगों की परमाणु ऊर्जा के खतरों के बारे में जागरूकता नहीं, बल्कि उनका सरकारी वादों के प्रति संदेह और अपनी आजीविका के उजड़ने का खतरा प्रमुख रहा होगा, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने उससे आगे बढ़कर परमाणु ऊर्जा के सर्वग्रासी और भस्मासुरी स्वरूप की भी जानकारी हासिल कर ली है। पिछले 4-5 वर्षों से जैतापुर के आसपास के लोग जाकर तारापुर के पड़ोसी गाँवों के निवासियों से मिल रहे थे और जानकारियाँ ले रहे थे उनसे जो खुद लगभग 50 बरस पहले के भुक्तभोगी रहे हैं। तारापुर वालों के बताये वो जानते हैं कि जो सरकार बिजली बनाने और फिर सस्ती बिजली देने का झुनझुना उन्हें पकड़ा रही है वो तारापुर में भी कर चुकी है और तारापुर के आसपास रह रहे लोगों को अभी भी 8-8 घंटे की बिजली कटौती का सामना करना पड़ता है। तारापुर प्रभावितों ने उन्हें सरकारी भ्रष्टाचार से तो आगाह किया ही, साथ ही आजीविका के साधनों पर परमाणु ऊर्जा के पड़ने वाले असरों के बारे में भी बताया कि किस तरह तारापुर संयंत्र से समुद्र में मिलाये जाने वाले पानी ने मछलियों की उपलब्धता को काफी हद तक घटाया है, लोगों में चर्मरोग व अन्य बीमारियाँ फैली हैं.... और उनमें से कोई जनता की मदद करने नहीं आया जो पहले जमीन लेने के लिए मान-मनुहार कर रहे थे।
प्रस्तावित जैतापुर परमाणु संयंत्र से प्रभावित गाँवों के लोग अब ये जानते हैं कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र के असर सिर्फ जमीन पर ही नहीं, हवा और पानी पर भी होते हैं और कई पीढि़यों तक खत्म नहीं होते। इन्हीं सब चीजों को जानते-समझते लोगों का विरोध लगातार जारी रहा। अनेक बार छुटपुट मुठभेड़ें भी हुईं लेकिन प्रधानमंत्री के बयान से पुलिस-प्रशासन को जैसे जैतापुर से परमाणु ऊर्जा विरोधियों को खदेड़ने की हरी झण्डी मिल गयी। दमन तेज हुआ और 18 अप्रैल 2011 को एक मछुआरे तबरेज सयेकर की पुलिस गोलीबारी में मौत हो गई। वो 600-700 लोगों की उस भीड़ का हिस्सा था जो जैतापुर में प्रस्तावित परमाणु संयंत्र का विरोध करने के लिए सखरी नाटे गाँव में इकट्ठा हुई थी। वो महज मछुआरा था, उसकी कोई जमीन नहीं जा रही थी। गाँववालों का और उसके परिवारवालों का इल्जाम है कि पहली गोली जब उसे लगी तब वो जीवित था और पुलिस ने उसे अस्पताल ले जाते समय रास्ते में मारा। उसे दिल, जिगर और किडनी के पास तीन गोलियाँ लगीं पायी गयीं।

उसके बाद भी सरकार का अडि़यल रवैया जारी रहा। देशभर में हो रहे विरोध की परवाह न करते हुए 23 अप्रैल 2011 को परमाणु संयंत्र के विरोध में तारापुर से जैतापुर यात्रा को पुलिस ने रोक दिया और लोकतांत्रिक तरीके से शान्तिपूर्ण विरोध कर रहे यात्रा में शामिल वैज्ञानिकों, पूर्व न्यायाधीशों, संस्कृतिकर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। करीब 200 लोगों के इस यात्रा जत्थे में भारतीय सेना के पूर्व एडमिरल एल. रामदास, मुंबई उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बी. जी. कोल्से पाटिल, जस्टिस पी. बी. सावंत, इंजीनीयर व वैज्ञानिक अशोक राव, सौम्या दत्ता, सामाजिक कार्यकर्ता गैब्रिएला डाइट्रिच, एडवोकेट मिहिर देसाई, प्रोफेसर बनवारीलाल शर्मा, वैशाली पाटिल, पत्रकार ज्योति पुनवानी, मानसी पिंगले समेत अनेक मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता शामिल थे। इन लोगों को जैतापुर तक नहीं जाने दिया गया। ये जिन बसों में जा रहे थे, उनके मालिकों को डराया धमकाया गया जिससे बस ड्राइवर बीच रास्ते में ही इन यात्रियों को छोड़ भाग निकले। एडमिरल एल. रामदास की अपील पर जैतापुर परियोजना को रद्द करने की माँग लेकर हजारों फैक्स प्रधानमंत्री कार्यालय को किए गए। लेकिन वरिष्ठ नागरिकों, वैज्ञानिकों और परमाणु ऊर्जा का अमनपूर्वक विरोध कर रहे लोगों की आवाज को भारत सरकार ने आसानी से अब तक अनसुना किया हुआ है।

सवाल केवल पर्यावरण या लोगों की आज की आजीविका या मुआवजे भर का ही नहीं है। परमाणु संयंत्र के साथ सुरक्षा और खतरों के दीर्घकालीन मुद्दे जुड़े होते हैं। परमाणु ऊर्जा बनाने के पहले उससे बनने वाले कचरे के इंतजाम की योजना बनानी जरूरी है। जो संयंत्र लगाया जा रहा है उसे सुरक्षा के पैमानों पर पूरी तरह से जाँचना जरूरी है और सबसे जरूरी है कि जिन लोगों को विस्थापित किया जा रहा है उन्हें पूरी जानकारी हांे और निर्णय प्रक्रिया में उनकी सहभागिता हो। जैतापुर के मामले में सब कुछ उल्टे तरीके से किया जा रहा है। फ्रांस की जिस ‘अरेवा’ कंपनी के बनाये संयंत्र को जैतापुर में स्थापित करने की कवायद की जा रही है, उसकी डिजाइन को सार्वजनिक नहीं किया गया है जबकि उसी तरह के उसी कंपनी के बनाये संयंत्रों पर योरप और अमेरिका की सरकारी एजेंसियों ने सवाल उठाये हैं। जैतापुर संयंत्र की मौजूदा अनुमानित लागत 328.6 अरब रुपये बतायी जा रही है जो परियोजना बनने तक और भी बढ़ जाएगी। परमाणु ऊर्जा के सवाल पर गोपनीयता का बहाना अपनाया जा रहा है। ये अब तक नहीं बताया जा रहा है कि इससे बनने वाली ऊर्जा की लागत क्या होगी, किस कीमत पर उसे बेचा-खरीदा जाएगा, किसी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में संयंत्र निर्माता कंपनी की और सरकार की जिम्मेदारियाँ क्या होंगी, अपराध निर्धारण के क्या प्रावधान होंगे, आदि ऐसे सवाल जिनसे लोगों को पता चले कि परमाणु ऊर्जा वाकई उनके लिए व पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है या फायदेमंद! और अब तो संसद ने न्यूक्लियर लाएबिलिटी विधेयक भी पारित कर दिया है जिससे किसी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में परमाणु संयंत्र सप्लाइ करने वाली कंपनी को नहीं बल्कि देश के भीतर उसका संचालन करने वाली कंपनी को जिम्मेदारी भुगतना होगी जो भारत में एन.पी.सी.आई.एल. है। भारत में परमाणु संयंत्रों को चलाने के लिए 1987 में एन.पी.सी.आई.एल. या न्यूक्लियर पाॅवर काॅपोरेशन आॅफ इंडिया लि. नाम की कंपनी बनायी गई। कहने को तो ये भारत सरकार की पब्लिक सेक्टर कंपनी है लेकिन जैसे सरकार भी कहने भर के लिए भारत सरकार कहलाती है, काम तो वो अमेरिकी हितों के ही करती है, वैसे ही ये कंपनी भी कहने भर को सार्वजनिक उपक्रम है, काम तो उसका भी अन्य काॅर्पोरेट कंपनियों की ही तरह मुनाफा कमाना है।

एनपीसीआईएल बनाने के भी पहले भारत सरकार ने 1983 में एक परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड बनाया था जिसका मुख्य कार्य परमाणु ऊर्जा से ताल्लुक रखने वाले मसलों में नियमन व सुरक्षा के पहलुओं पर नजर रखना है। इस बोर्ड के नब्बे के दशक के मध्य में अध्यक्ष रहे डाॅ. ए. गोपालकृष्णन ने जैतापुर के परमाणु संयंत्र के असुरक्षित होने के बारे में अपनी चिंताएँ प्रकट करते हुए फरवरी 2011 में एक लेख के जरिए ये सवाल उठाये कि जब भारत में बने प्रेशराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर की लागत आज के मूल्य के मुताबिक करीब 8 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट की है तो भारत सरकार फ्रांस की अरेवा कंपनी से योरपियन प्रेशराइज्ड रिएक्टर क्यों खरीद रही है जिसका दुनिया में न तो अब तक कहीं परीक्षण हुआ है और जिसकी लागत भी 20 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट पड़ेगी।

इसके जवाब में एनपीसीआईएल की ओर से डाॅ. गोपालकृष्णन का मखौल उड़ाते हुए जवाब दिया गया कि दुनिया में बहुत सारी जगहों पर ऐसे रिएक्टर लगे हैं जिनका पूर्व में कोई परीक्षण नहीं हुआ था। खुद भारत के ऐसे अनेक रिएक्टरों की मिसाल उन्होंने दी। उन्होंने कहा कि रिएक्टर जब तक लगेगा नहीं तब तक उसका परीक्षण कैसे होगा।

एनपीसीआईएल जैसी विशेषज्ञों-वैज्ञानिकों से भरी पड़ी कंपनी से एक आम नागरिक के तौर पर कोई भी ये जानना चाहेगा कि क्या परीक्षण के लिए थोड़ी कम क्षमता वाले रिएक्टर से काम नहीं चल सकता था जो सीधे दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु संयंत्र (10000 मेगावाट) परीक्षण के लिए भारत ले आए? या क्या अरेवा कंपनी के अपने देश फ्रांस में इसके परीक्षण के लिए कोई जगह नहीं बची थी? या बहादुरी के मामले में भारत को ऐसी कोई मिसाल कायम करके दिखानी है कि देखो, हम दुनिया का सबसे बड़ा अ-परीक्षित परमाणु संयंत्र लगाने की भी हिम्मत रखते हैं !

भारत में परमाणु दुर्घटना क्यों नहीं हो सकती???
भारत में 20 परमाणु संयंत्र काम कर रहे हैं और पाँच निर्माणाधीन हैं। सरकार कितनी तेजी से परमाणु ऊर्जा के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहती है , ये इससे स्पष्ट है कि उसके पास भविष्य के लिए 40 रिएक्टरों की योजनाएँ व प्रस्ताव मौजूद हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने अपनी किस्म की विकसित की गई तकनीक के साथ परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में जो भी कदम बढ़ाये थे, वे पिछले दौर में अमेरिका के साथ किये गए 123 समझौते के साथ पिछड़ गए हैं। अब हम एक तरह से मजबूर हैं कि हमारे वैज्ञानिक दूसरों के इशारों पर काम करें। प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने फ्रांस, आॅस्ट्रेलिया, स्वीडन और रूस के साथ ये करार किया है कि भारत इन चारों देशों से 10-10 हजार मेगावाट क्षमता के रिएक्टर खरीद कर अपने देश में स्थापित करेगा। ये हमारे देश की नयी विदेश नीति का नतीजा है जो हमारे सत्ताधीशों ने साम्राज्यवादी ताकतों के सामने गिरवी रख दी है। फ्रांस की अरेवा कंपनी से लिये जाने वाले 10 हजार मेगावाट क्षमता के रिएक्टर उसी करार की नतीजा है।
जब हम अपनी जानी-पहचानी, घरेलू तौर पर विकसित की गई तकनीक के साथ काम करते थे तब भी मानवीय भूलें होती थीं। अब एक अपरीक्षित और अपरिचित मशीन हमारे वैज्ञानिक सँभालेंगे तो गलतियों की गुंजायश भी ज्यादा हो सकती है। पहले भी भारत में राजस्थान के परमाणु संयंत्र में 1992 में 4 टन विकिरणयुक्त पानी बह गया था और तारापुर में भी 1992 में 12 क्यूरीज रेडियोध्र्मिता फैली थी।
तो भारत के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है जिससे इस देश के उच्च शिक्षित प्रधानमंत्री ये दावा करते हैं कि भारत के जैतापुर परमाणु संयंत्र में ऐसी कोई दुर्घटना कभी नहीं घटेगी, इसलिए संयंत्र का काम आगे बढ़ाना चाहिए।

विशेषज्ञों की दिव्य बातें
जाहिर है ऐसा विश्वास प्रधानमंत्री को उनके विशेषज्ञ ही दिला सकते हैं। जैतापुर परमाणु संयंत्र से जुड़े एक भौतिकविद् और कोल्हापुर के डी. वाय. पाटिल विश्वविद्यालय के कुलपति । डॉ. एस. एच. पवार ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा कि जापान में 8.9 तीव्रता का जो भूकंप आया था, उससे सूनामी की लहरें पैदा हुईं लेकिन भूकंप से फुकुशिमा के परमाणु संयंत्र का कुछ नहीं बिगड़ा। परमाणु संयंत्र में जो विस्फोट हुआ, वो पानी के रिएक्टर में घुस जाने की वजह से जो बिजली गुल हुई और उससे जो परमाणु ईंधन को ठंडा करने का जो सिस्टम था, वो फेल हो गया, इसलिए विस्फोट हुआ।

दूसरी दिव्य ज्ञान की बात उन्होंने ये बतायी कि जैतापुर समुद्र की सतह से करीब 72 फीट की ऊँचाई पर है जिससे अगर कभी महाराष्ट्र में सूनामी आती भी है तो ‘उनके ख्याल से’ वो इतनी ऊँचाई पर नहीं पहुँच पाएगी।
तीसरी सबसे महत्त्वपूर्ण बात उन्होंने ये कही कि भारत को परमाणु विकिरणों से निपटने की तैयारी को तेज करना चाहिए। हमें ऐसे लोग तैयार करने चाहिए जो परनाणु विकिरणों से पैदा होने वाली परिस्थितियों से निपट सकें। डाॅ. पवार ने ये भी बताया कि इसके लिए उनके विश्वविद्यालय ने अभी से ही कोर्सेस भी खोल दिए हैं।

डाॅ. पवार के ये कथन किसी और व्याख्या की जरूरत नहीं छोड़ते। इन्हें पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि चूँकि फुकुशिमा में रिएक्टर में विस्फोट भूकंप से नहीं हुआ बल्कि भूकंप से जो सूनामी उठी और सूनामी से जो पानी घुसा और उससे जो बिजली की आपूर्ति में रुकावट आयी, उससे विस्फोट हुआ। और इसीलिए भले ही जैतापुर में भूकंप आयें लेकिन यहाँ ‘डाॅ. पवार के ख्याल से’ कभी सूनामी तो आएगी नहीं इसलिए यहाँ कभी बिजली आपूर्ति अवरुद्ध नहीं होगी और इसीलिए यहाँ कभी विस्फोट भी नहीं होगा। ऐसा लगता है कि सूनामी ने तो जैसे डाॅ. पवार से ही वादा किया है कि वो 72 फीट ऊँचाई तक कभी नहीं आएगी। डाॅ. पवार के इंटरव्यू से ऐसा भी लगता है कि वैसे कोई दुर्घटना कभी होगी नहीं लेकिन फिर भी अगर कुछ गड़बड़ हो ही जाती है तो विकिरण प्रभावितों का इलाज और देखभाल करने वाले लोगों को प्रशिक्षण देने के नये कोर्सेस विश्वविद्यालय ने चालू कर ही दिए हैं। डाॅ. पवार के इन अत्यंत बुद्धिमानीपूर्ण कथनों को एनपीसीआईएल ने अपनी वेबसाइट पर एक बयान की तरह चस्पा कर रखा है।

खुद सरकारी भूगर्भीय सर्वेक्षण की रिपोर्टें बताती हैं कि जैतापुर भूकम्प संवेदी इलाके में मौजूद है और गुजरे 20 वर्षों में इस क्षेत्र में 92 छोटे-बड़े भूकंप आ चुके हैं। और फिर भारत के जो राजनेता हैं, जो ठेकेदार हैं, जो अफसरशाही है, वो क्या किसी से कम है? जो खेल के सामान में, जेल के सामान में, फौज के सामान में, पुल के, सड़क के, दवाई के, पानी के या किसी भी क्षेत्र में कमीशन लेकर घटिया सामान चलवा सकते हैं, जो जमीन पर ही नहीं, आकाशीय स्पेक्ट्रमों में भी और खेतों में ही नहीं गोदामों में भी भ्रष्टाचार की पताका फहरा सकते हैं, वे जैतापुर में भला क्यों नहीं ऐसा करेंगे। और अगर किया तो क्या वो हादसा किसी पुल या पानी की टंकी के गिर जाने जितना ही कहा जा सकता है?

कचरा भी खतरा
परमाणु ईंधन से अगर आपने बिजली बना भी ली तो भी परमाणु ईंधन के बाद बचने वाले कचरे को ठिकाने की समस्या तो फिर भी बनी ही रहती है। अप्रैल, 2010 में अमेरिकी राष्ट्रति बराक ओबामा ने जाॅर्ज बुश के जमाने से चले आ रहे इस तर्क का इस्तेमाल 47 देशों के वाशिंगटन परमाणु सम्मेलन में किया कि परमाणु हथियारों के आतंकवादी समूहों के हाथ लग जाने का खतरा सबसे बड़ा है। हालाँकि जाॅर्ज बुश ने किसी एक मौके पर देशवासियों के नाम संदेश में आतंकवाद के साथ-साथ परमाणु कचरे को भी मानवता और अमेरिका के लिए बड़ा संकट बताया था। ओबामा ने परमाणु खतरे के संकट का जिक्र भले टाल दिया लेकिन उससे संकट कहीं भी टला नहीं है। बल्कि अमेरिका में नेवादा इलाके में जहाँ परमाणु कचरे को युक्का पर्वत के नीचे दफन करने की योजना पूर्व में बनी थी, उसे भी ओबामा प्रशासन ने रोक दिया है। इसका सीधा मतलब ये है कि अमेरिका के पास भी अभी तक कोई दूरगामी नीति नहीं है कि वो अपने परमाणु कचरे से कैसे पीछा छुड़ाएगा।

ये परमाणु कचरा भीषण विकिरण समाये रहता है और इसकी देखभाल हजारों बरसों तक करना जरूरी होती है। कुछ रेडियोधर्मी तत्वों के परमाणु संयोजन तो विघटित होने में लाखों वर्षों का समय भी लेते हैं। हर परमाणु संयंत्र से निकलने वाले कचरे को और इस्तेमाल हो चुके परमाणु ईंधन को मोटी-मोटी दीवारों वाले कंटेनरों में सील कर जमीन के भीतर गहरे रखा जाता है और ये एहतियात बरतनी होती है कि उनसे किसी किस्म का रिसाव न हो। अगर रिसाव होता है तो वह भूगर्भीय जल के साथ मिलकर असीमित तबाही मचा सकता है। रिसाव के कुछ हादसे हुए भी है लेकिन इस तरह के हादसों को छिपाया जाता है क्योंकि इनके पीछे कंपनियों का अस्तित्व टिका रहता है।

प्राथमिकता क्या है?
सवाल सिर्फ इतना है कि हमारी प्राथमिकता क्या है? वैज्ञानिक तरक्की और इंसान के अस्तित्व में से अगर चुनने का मौका आये तो क्या चुनेंगे? परमाणु ऊर्जा के लिए क्या हम उन्हीं जिंदगियों को दाँव पर लगाने को तैयार हैं जिनकी जिंदगी को आरामदेह बनाने के लिए हमें ऊर्जा चाहिए। जापान के प्रधानमंत्री ने हाल में कहा है कि परमाणु ऊर्जा के बारे में उन्हें पूरी तरह नये सिरे से सोचना शुरू करना होगा। वैसे भी यह एक मिथ्या प्रचार है कि परमाणु ऊर्जा प्रदूषणरहित होती है या वो सस्ती होती है। पुरानी कहावत है कि सस्ता है तो क्या जहर खा लें ! और ये तो सस्ता भी हर्गिज नहीं। परमाणु संयंत्र के परमाणु कचरे का निपटारा किसी भी और प्रदूषण से ज्यादा खतरनाक होता है और अगर इस कचरे के निपटान की लागत व परमाणु संयंत्र की उम्र खत्म होने के बाद उसके ध्वंस (डीकमीशनिंग) की लागत भी परमाणु संयंत्र में जोड़ दी जाए तो ये किसी भी अन्य जरिये से ज्यादा महँगी पड़ती है।

जहाँ तक ऊर्जा की कमी का सवाल है, ये ऊर्जा की उपलब्धता से कम और उसके असमान वितरण से अधिक जुड़ा हुआ है। पिछले दिनों वैज्ञानिक डाॅ. विवेक मोंटेरो ने इसका खुलासा करते हुए बताया कि मुंबई में एक 27 मंजिला मकान है जिसमें एक परिवार रहता है और इसमें हैलीपैड, स्वीमिंग पूल आदि तरह-तरह की सुविधाएँ मौजूद हैं। इस बंगले में प्रति माह 6 लाख यूनिट बिजली की खपत होती है। ये बंगला अंबानी परिवार का है। दूसरी तरफ शोलापुर में रहने वाले दस हजार परिवारों की कुल मासिक खपत भी 6 लाख यूनिट की है। अगर देश में बिजली की कमी है तो दस हजार परिवारों जितनी बिजली खर्च करने वाले अंबानी परिवार को तो सजा मिलनी चाहिए लेकिन उल्टे अंबानी को इतनी ज्यादा बिजली खर्च करने पर सरकार की ओर से कुल बिल पर 10 प्रतिशत की छूट भी मिलती है।

जर्मनी में उन संयंत्रों को डीकमीशन करने पर भी विचार चल रहा है जो पहले से मौजूद हैं। बहुत से देश ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों पर शोध को प्रोत्साहन पहले से ही दे रहे हैं। वैसे भी परमाणु ऊर्जा में भी पानी की खपत बेतहाशा होती है क्योंकि रिएक्टर को ठंडा रखने के लिए मुख्य रूप से पानी ही इस्तेमाल किया जाता है। पानी की उपलब्धता के कारण ही परमाणु संयंत्र समुंदर या नदी के किनारे लगाये जाते हैं ताकि पानी की कमी न पड़े लेकिन इसी वजह से परमाणु संयंत्रों पर वो सारे खतरे बढ़ भी जाते हैं जो नदी में बाढ़ से हो सकते हैं या समुद्र में तूफान, सूनामी से। जैतापुर परमाणु संयंत्र में रोज करीब 5500 करोड़ लीटर पानी चाहिए होगा जिसे इस्तेमाल के बाद वापस समुद्र में फेंका जाएगा जिससे समुद्र का पूरा जैव संतुलन भी बिगड़ सकता है।

बेशक परमाणु संयंत्र से होने वाले रिसाव या दुर्घटना से लोग एक झटके में नहीं मारे जाते जैसे परमाणु बम से मरते हैं लेकिन परमाणु संयंत्र से जो विकिरण फैलता है वो परमाणु बम से फैलने वाले विकिरण की तुलना में कई गुना ज्यादा होता है। और हजारों-लाखों वर्षों तक उसका विकिरण समाप्त नहीं होता। अगर हिरोशिमा-नागासाकी ने हमें ये सिखाया था कि हम परमाणु बम से तौबा करें वैसे ही फुकुशिमा से हमें ये सीख लेना चाहिए कि परमाणु ऊर्जा थोड़ी-बहुत विज्ञान समझने या प्रयोगशालाओं के भीतर प्रयोग करने के लिए ही ठीक है। जब तक हमें ये न पता हो कि किसी काम के परिणाम को हम कैसे सँभालेंगे, हम उसे कैसे शुरू कर सकते हैं। और परमाणु ऊर्जा में सिर्फ ऊर्जा नहीं, बल्कि भीषण विकिरण और विकिरणयुक्त कचरा भी है। जैतापुर संयंत्र को रोकना जनता, पर्यावरण और इंसानियत - तीनों के लिए जरूरी है। जनता के पक्ष में इसके दीर्घकालीन वैज्ञानिक व राजनीतिक मायने भी होंगे।

-विनीत तिवारी

  स्रोत - http://loksangharsha.blogspot.com/2011/06/blog-post_28.html

परम ऊर्जाः चरम विनाश



परमाणु आयोग की योजना इस अत्यंत जहरीले कचरे को कांच में बदल कर एक ही जगह स्थिर कर देने की है। इस कांच बने कचरे को विशेष प्रकार के शीतगृह में 20 साल तक रखा जाएगा। फिर अंत में उसे किसी ऐसी जगह रखना होगा जहां पानी, भूचाल, युद्ध या तोड़-फोड़ की कोई भी घटना हजारों साल तक उसे छेड़ न सके।
परमाणु समझौते को लेकर देश में चल रही बहस में ‘बिजली और बम’ की चिंता प्रमुख है। कहा जा रहा है कि अमेरिका के साथ हुए समझौते ने हमारे लिए फिर से परमाणु बिजली बनाने का दरवाजा खोल कर हमारा बम बनाने का रास्ता बंद कर दिया है। लेकिन देश में कुछ अपवाद छोड़ दें तो किसी ने भी परमाणु बिजली पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया है। आज दो-चार पीढ़ियों को कोयले के मुकाबले बेहद साफ सुथरी बिजली, प्रकाश देने के आश्वासन पर यह आने वाली सैकड़ों पीढ़ियों को भयानक अंधकार में धकेल देगी। अभी तो हम प्लास्टिक का कचरा भी ठिकाने नहीं लगा पाए हैं, परमाणु बिजली के भयानक कचरे को भला कैसे संभाल पाएगें। आज से कोई 21 वर्ष पहले लिखा यह लेख आंकड़ों के हिसाब से पुराना, अधूरा भले ही हो, परमाणु ऊर्जा के खतरों पर एकदम नया प्रकाश डालता है।

सन् 1945 में श्री होमी भाभा ने देश के लिए ‘असीम’ परमाणु ऊर्जा की संभावना का संकेत दिया था। तभी से इस संभावना को सच करने का सपना शुरू हुआ। आज देश में कोई अरबों रुपयों का परमाणु साम्राज्य फैला हुआ है, जिसमें यूरेनियम की खदान, ईंधन निर्माण के कारखाने, भारी पानी संयंत्र, परमाणु बिजली घर और काम आ चुके ईंधन को फिर से उपचारित करने के संयंत्र आदि शामिल हैं। देश के पांचवें परमाणु रिएक्टर का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि, “कुछ राष्ट्र हमें प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में मजबूत नहीं बनने देना चाहते थे... पर यह सफलता हमारे स्वावलंबी होने के संकल्प का प्रमाण है।” मद्रास एटमिक पावर प्रोजेक्ट की उस पहली इकाई के 90 प्रतिशत कलपुर्जे देशी बताए गए थे।

परमाणु ऊर्जा आयोग एक ऐसा सरकारी संगठन है, जिसे धन की कमी कभी नहीं पड़ी। हर एक पंचवर्षीय योजना में ऊर्जा विभाग के हिस्से का 2 से 5 प्रतिशत तक इस आयोग को जाता रहा है। केंद्र सरकार के सालाना बजट में ऐसे शोध और विकास कार्य के लिए रखी जाने वाली कुल राशि का भी कोई 15 से 25 प्रतिशत परमाणु ऊर्जा को दिया जाता है।

परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को बल पहुंचाने वाले अनेक सहायक संगठन देश भर में फैले हुए हैं। सबसे पुराना और अत्यंत गौरवशाली माना गया परमाणु संस्थान ट्रांबे का भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र है। यह देश में हल्के और भारी पानी रिएक्टरों के शोध का संस्थान है। यहां से अन्य कोई शोध-रिएक्टरों का संचालन भी होता है। देश का दूसरा परमाणु अनुसंधान केंद्र मद्रास के पास कलपक्कम का ‘रिएक्टर रिसर्च सेंटर’ है, जिसने मुख्य रूप से फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।

यूरेनियम का खनन बिहार के सिंहभूम के पास जादूगोड़ा में भारतीय यूरेनियम निगम करता है। खदान और उसकी सहायक मिलों की क्षमता रोजाना 1,000 टन यूरेनियम को उपचारित करने की है। निगम नखापहाड़ और तुरमडीह में दो और खदानें जल्दी ही शुरू करने की तैयारी कर रहा है। ये दोनों जमशेदपुर के पास हैं। इन पर कोई 100 करोड़ रुपए लगाने वाले हैं। इनसे नए परमाणु बिजली घरों के लिए ईंधन की आपूर्ति हो सकेगी। खदान से निकले यूरेनियम को हैदराबाद के पास बने परमाणु ईंधन समवाय को भेजा जाता है, जहां कोटा और कलपक्कम के परमाणु रिएक्टरों के लिए ईंधन की छड़ें बनाने के लिए उसे तोड़कर टिकियां बनाई जाती हैं और फिर उन्हें जिर्कोलॉय ट्यूबों में भरा जाता है। जिर्कोलॉय का निर्माण केरल से मंगाए गए जिरकोनियम रेत से किया जाता है। तारापुर के हल्के पानी के रिएक्टरों के लिए परिष्कृत यूरेनियम बाहर से आता है और यहां उसे तोड़ा जाता है।

तारापुर के रिएक्टरों को छोड़कर बाकी सभी कार्यरत और निर्माणाधीन रिएक्टर ‘केंडु’ (केनेडियन ड्यूटेरियम टाईप) नमूने के हैं। ये भारी पानी का उपयोग करते हैं। इनमें खासी पूंजी लगती है। फिर भी परमाणु ऊर्जा आयोग ने केंडु रिएक्टर ही पसंद किए हैं। उसमें प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन के रूप में काम आता है और इसका निर्माण देश में ही किया जा सकता है। इससे विदेशों से ईंधन मांगने की झंझट से छुटकारा मिल सकता है और उस अंतर्राष्ट्रीय दबाव से भी मुक्ति मिल सकती है, जिसका सामना तारापुर के परिष्कृत यूरेनियम ईंधन के मामले में करना पड़ा है।

लेकिन यह उपाय तभी सफल होगा जब देश पर्याप्त भारी पानी तैयार कर ले। आज तीन जगह-नांगल (14 टन), वड़ोदरा (67 टन) और तूतिकोरिन (71 टन) में भारी पानी संयंत्र हैं, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 150 टन सालाना की है। कोटा में (100 टन) औ तलसचर (62 टन) में दो और संयंत्र लगाने की तैयारी हो रही है। इन पांच संयंत्रों पर देश ने 220 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। थाल (110 टन) तथा मनुगुरु (185 टन) में दो और बड़े संयंत्र तैयार हो रहे हैं, जिन पर क्रमशः 188 करोड़ और 422 करोड़ रुपए खर्च होंगे। ऐसा ही एक तीसरा संयंत्र हजीरा में भी स्थापित करने की बात सोची जा रही है।

इस तरह देश के परमाणु बिजली कार्यक्रम का मूल आधार भारी पानी बनता जा रहा है। कोटा के संयंत्र के सिवाय बाकी सभी संयंत्र विदेशी ठेकेदारों की मदद से बने हैं। नांगल का निर्माण पश्चिम जर्मनी के ठेकेदारों ने किया था। वड़ोदरा और तुतिकोरिन के संयंत्र स्विट्जरलैंड की एक तथा फ्रांस की दो कंपनियों के मिले-जुले दल ‘गेलप्रा’ ने तैयार किए थे। वड़ोदरा, तूतिकोरिन और तलचर के संयंत्र अमोनिया-हाइड्रोजन की अदला-बदली वाली प्रक्रिया से और आगे-पीछे रासायनिक खाद कारखानों के साथ मिल कर काम करते हैं। इस प्रक्रिया से काम करने वाला संयंत्र दुनिया में सिर्फ एक और है। यह फ्रांस के माझिंगरबे नामक स्थान में है। उसका निर्माण भी गेलप्रा ने किया था। उसने 1968 से बस 1972 तक ही काम किया। इस प्रकार तूतिकोरिन और तलचर के संयंत्र एक विवादास्पद पद्धति से बनाए गए हैं।

दुनिया का अधिकांश भारी पानी अमेरिका और केनडा में हाइड्रोजन सल्फाइड/पानी की अदला-बदली वाली प्रक्रिया से तैयार होता है। पर अमेरिका और केनडा उसे बनाने का तरीका भारत को देना नहीं चाहते थे। इसलिए देश के इंजीनियरों को उस प्रक्रिया की रूपरेखा खुद ही बना लेनी पड़ी। अग्रगामी परियोजना बनाकर छोटी मात्रा में उसके निर्माण का तजुर्बा लिए बगैर ही कोटा में 100 टन क्षमता का संयंत्र बना लिया गया।

नांगल के बहुत ही छोटे-से संयंत्र को छोड़कर भारी पानी के बाकी सभी संयंत्र संकट में है। डिजाइन में गलती रह जाने के कारण वड़ोदरा के संयंत्र में 1977 में परीक्षण के समय विस्फोट हो गया था और उसे फिर 1981 तक खाली रखना पड़ा। फिलहाल संयंत्र ठीक से काम कर रहा है। लेकिन क्षमता का आधे से कम ही काम हो रहा है। कोटा के संयंत्र में व्यावसायिक स्तर पर काम अभी शुरू हुए चार वर्ष ही हुए हैं, फिर भी समस्याएं आने लगी हैं। तलचर के संयंत्र में दो साल की देरी की गई क्योंकि उसमें दो एक्सचेंज टावर नहीं थे। बताया जाता है कि 1975 में पश्चिम जर्मनी से जहाज द्वारा लाते समय पुर्तगाल के पास समुद्र में वे कहीं खो गए। 66 करोड़ रुपए के इस संयंत्र का निर्माण 1972 में शुरू हुआ था। तूतिकोरिन के संयंत्र ने 1978 और 1979 में कुछ हफ्ते ही काम किया, फिर तकनीकी खराबी तथा श्रमिकों के झगड़े के कारण बंद हो गया। आयोग के अनुसार 1983-84 में उसने एक तिहाई क्षमता तक काम किया और अब बिल्कुल अच्छा काम कर रहा है। भारी पानी के इन चार बड़े संयंत्रों की कुल क्षमता सालाना 301.2 टन की होते हुए भी इसने सालाना 14 टन क्षमता के छोटे-से नांगल संयंत्र से भी कम काम किया।

परमाणु बिजली संयंत्रों से पैदा होने वाला भयानक जहरीला रेडियमधर्मी कचरा परमाणु उद्योग के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। उस कचरे को न केवल प्लूटोनियम से अलग करते समय बेहद सावधानी के साथ संभालना पड़ता है, बल्कि हजारों साल तक उसके भंडारण का इंतजाम भी करना पड़ता है।
परमाणु बिजली संयंत्रों से पैदा होने वाला भयानक जहरीला रेडियमधर्मी कचरा परमाणु उद्योग के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। उस कचरे को न केवल प्लूटोनियम से अलग करते समय बेहद सावधानी के साथ संभालना पड़ता है, बल्कि हजारों साल तक उसके भंडारण का इंतजाम भी करना पड़ता है। अनेक लोगों का मानना है कि इस समस्या का कोई भी समाधान नहीं है।

आयोग की योजना कचरे के उपचार वाले संयंत्रों को परमाणु बिजली घरों के पास ही बनाने की है ताकि इस खतरनाक चीज को दूर-दूर तक ले जाने का काम कम ही हो सके।

एक बार प्लूटोनियम को अलग कर लेने के बाद परमाणु आयोग की योजना इस अत्यंत जहरीले कचरे को कांच में बदल कर एक ही जगह स्थिर कर देने की है। इस कांच बने कचरे को विशेष प्रकार के शीतगृह में 20 साल तक रखा जाएगा। फिर अंत में उसे किसी ऐसी जगह रखना होगा जहां पानी, भूचाल, युद्ध या तोड़-फोड़ की कोई भी घटना हजारों साल तक उसे छेड़ न सके। पर ऐसी जगह मिलना मुश्किल है। हिमालय, सिंधु-गंगा के कछार, थार रेगिस्तान और दक्षिणी पठार आदि भूजल की अधिकता या भूचाल की संभावना जैसे कारणों के आधार पर रद्द किए जा चुके हैं। लेकिन परमाणु ऊर्जा आयोग के वैज्ञानिक मानते हैं कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र और उससे लगे आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ जिलों का कंकरीला पठार इसके लिए उपयोगी हो सकता है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के इलाकों की भी जांच हो रही है। बंगलूर के पास कोलार की खदान के काम में न लाए गए हिस्सों में एक प्रायोगिक शोध केंद्र भी स्थापित किया गया है। इस कचरे के स्थायी निपटान के लिए एक भंडार घर तैयार करने की बात भी सोची जा रही है।

निरापद कोई जगह मिल भी गई तो जरा सोचिए कि वहां हजारों साल तक उसकी सुरक्षा करने के लिए देश को किस तरह के राजनैतिक, सैनिक ढांचे की जरूरत पड़ेगी! क्या ढांचा हमारे लोकतंत्र में निभ पाएगा?

फिर भी अगर देश की अगली शताब्दी में परमाणु बिजली की पूरी आवश्यकता का एक समुचित हिस्सा भी ठीक से उत्पादन करना है, जो दसियों हजार मेगावाट होगा, तो गैर-प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन वाला पद्धति को अपनाना ही होगा।

  लेखक: अनिल अग्रवाल और प्रफुल्ल बिदवई  

 सितम्बर-अक्टूबर 2008, गांधी मार्ग






परमाणु ऊर्जा के प्रसार के खतरे




यह समय सिद्ध है कि परमाणु ऊर्जा न तो साफ सुथरी है और न ही सस्ती! इसके अलावा दुर्घटना की स्थिति में होने वाले विनाश का आकलन कर पाना भी कठिन है। इसके विकिरण सैकड़ों-हजारों वर्षों तक पर्यावरण में विद्यमान रहेंगे और मानवता को नुकसान पहुंचाते रहेंगे। भारत के राजनीतिज्ञों ने परमाणु ऊर्जा विकास को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है और देश की सुरक्षा को दरकिनार कर दिया है। 

लेखक -  भारत डोगरा 

भारत सरकार परमाणु ऊर्जा के तेज प्रसार का निर्णय ले चुकी है। नए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से अभी तक हम जितनी बिजली पूरे देश में प्राप्त कर सके हैं, उससे कहीं अधिक बिजली निकट भविष्य में मात्र एक परियोजना, महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र के रत्नागिरी जिले में स्थित जैतापुरा जहां 1650 मेगावाट के छः सयंत्र लगाने से अथवा 9900 मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता से प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। इस विशालकाय परियोजना का विरोध वैसे तो स्थानीय लोग आरंभ से कर रहे हैं, पर जापान के फुकुशिमा हादसे के बाद इस विरोध ने और अधिक जोर पकड़ा है। वैश्विक जन-विरोध को फुकुशिमा के बाद बेहतर समझा जा रहा है और उसे अधिक व्यापक समर्थन मिल रहा है। परंतु महाराष्ट्र सरकार के दृष्टिकोण में बहुत कम परिवर्तन आया है। वह इस परियोजना को हर हालत में आगे ले जाने के लिए तैयार लगती है। भारत सरकार के दृष्टिकोण में बस इतना सा फर्क आया है कि सुरक्षा पक्ष को थोड़ा सा और पक्का कर दिया जाए। स्थानीय लोग इतने से ही संतुष्ट नहीं हैं एवं वे इस परियोजना को रोकना चाहते हैं। स्थानीय संगठनों का यह विरोध सुरक्षा, आजीविका, पर्यावरण की रक्षा के लिए है जबकि राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए शिवसेना ने अलग से इस आंदोलन को राजनीतिक रंग दे दिया है।

सरकार और स्थानीय लोगों में परमाणु संयंत्रों संबंधी सोच में बुनियादी विरोध के कारण यहां बार-बार टकराव की स्थिति उत्पन्न हो रही है। इस तरह के परमाणु संयंत्रों के बढ़ते विरोध के समाचार हरियाणा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों से भी मिलते रहे हैं जहां नए परमाणु संयंत्र प्रस्तावित हैं। तिस पर मुद्दा केवल स्थानीय लोगों के विरोध का नहीं है। कई ख्याति प्राप्त विशेषज्ञ व यहां तक कि सरकार में जिम्मेदार पदों पर कार्य कर चुके विशेषज्ञ भी जैतापुर परियोजना के विरुद्ध आवाज उठा चुके हैं। साथ ही इन विशेषज्ञों ने परमाणु ऊर्जा के तेज प्रसार के विरुद्ध भी चेतावनी भी दी है।

फुकुशिमा हादसे ने एक बार फिर याद दिला दिया है कि परमाणु ऊर्जा के संयंत्रों की दुर्घटनाएं कितनी गंभीर हो सकती हैं, उनसे कितनी व्यापक व दीर्घकालीन क्षति हो सकती है। चेरनोबिल दुर्घटना के असर के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ की परमाणु विकिरण पर गठित वैज्ञानिक समिति ने बताया है कि इसके कारण कैंसर के 34000 से 140000 अतिरिक्त मामले सामने आए, जिनसे 16000 से 73000 मौतें हुईं। चेरनोबिल दुर्घटना के बाद पश्चिमी यूरोप में कोई भी नया परमाणु बिजली संयंत्र नहीं स्थापित किया गया। जर्मनी ने यहां तक कहा कि जो परमाणु संयंत्र पहले से स्थापित किए गए हैं उन्हें निश्चित समय अवधि में हटाया जाना चाहिए। यूरोपीयन यूनियन में जहां वर्ष 1979 में 177 परमाणु ऊर्जा संयंत्र सक्रिय थे वहां इस समय मात्र 143 संयंत्र सक्रिय हैं।

परमाणु बिजली उद्योग ने यह भ्रम फैलाने का प्रयास किया है कि चेरनोबिल व फुकुशिमा अपवाद हैं तथा परमाणु संयंत्रों में गंभीर दुर्घटना की संभावना बहुत कम है। पर यह भ्रामक प्रचार है क्योंकि मेल्टडाऊन के साथ अन्य गंभीर दुर्घटनाओं को जोड़कर देखा जाए तो ऐसी काफी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। इन दुर्घटनाओं का आकलन किसी देश या दुनिया के स्तर पर रिएक्टर वर्ष के आधार पर किया जाता है। रिएक्टर वर्ष का अर्थ है कि जितने परमाणु वर्ष हैं उसे उनकी कार्य अवधि के वर्षों से गुणा कर दिया जाए। जाने माने वैज्ञानिक एम.वी. रमना ने हाल में अनुमान प्रस्तुत किया कि 1400 रियक्टर वर्ष में एक गंभीर दुर्घटना की संभावना है। इसका अर्थ यह हुआ कि 437 रिएक्टरों वाले हमारे विश्व में लगभग तीन वर्षों में एक गंभीर दुर्घटना की संभावना है। छोटी दुर्घटनाएं तो कहीं अधिक होती हैं और ये भी कई लोगों के लिए काफी दर्दनाक हो सकती हैं।

हाल में फुकुशिमा में हुई दुर्घटना के समय देखा गया कि एक देश में होने वाली ऐसी दुर्घटना से नजदीक के अन्य देशों में भी दहशत फैल सकती है। उच्च कोटि की तकनीक उपलब्ध होने पर भी इन दुर्घटनाओं को रोक पाने या नियंत्रित कर पाने की कोई गारंटी नहीं है। इनके दुष्परिणाम बहुत दीर्घकालीन होते हैं व कुछ परिणाम जैसे बच्चों के जन्म के समय उपस्थित होने वाली विकृतियां तो बहुत दर्दनाक होती हैं।

इसके अतिरिक्त यूरेनियम के खनन से लेकर परमाणु ऊर्जा के उत्पादन की प्रक्रिया से जनित अवशेष पदार्थों को ठिकाने लगाने की लगभग सभी प्रक्रियाएं तरह-तरह के जोखिमों से भरी हुई हैं। खतरनाक अवशेष पदार्थों के बारे में संतोषजनक समाधान तो अभी किसी के पास नहीं है।

विभिन्न खतरों के बारे में परमाणु बिजली उद्योग का कहना है कि तरह-तरह की नई तकनीकों और सुधारों से सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर किया जा रहा है। पर परमाणु संयंत्रों से जुड़ी दुर्घटनाओं की संभावना कुछ ऐसी है कि इन सुधारों से भी संतोषजनक समाधान अभी नहीं मिल रहा है। फिर यह बताना भी जरूरी है कि जैसे-जैसे सुरक्षा उपायों का खर्च बढ़ता है वैसे-वैसे परमाणु बिजली अधिक महंगी होती जाती है। जहां एक समय परमाणु ऊर्जा को अपेक्षाकृत सस्ते विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया था वहीं आज यह एक महंगा स्रोत बन चुका है। जैतापुर में लगने वाले रिएक्टर की पूंजी लागत 5000 डालर प्रति किलोवाट आंकी जा रही है जबकि कोयले आधारित तापघर की लागत 1000 डालर प्रति किलोवाट होती है।

देश के जाने माने परमाणु विशेषज्ञ गोपालकृष्णन परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के शीर्ष के पदों पर रह चुके हैं। उन्होंने कहा है कि जैतापुर में जो ईपीआर संयंत्र लगाए जा रहे हैं वे पहले कहीं कमीशन नहीं किए गए हैं अतः उनकी संभावित समस्याओं के बारे में अभी इन्हें बनाने वाली कंपनी अरेवा को भी पता नहीं है। इसके अवशेष पदार्थों को विशेष व अधिक कठिन समस्याओं से भी जूझना पड़ेगा। उन्होंने आगे कहा कि यह बहुत महंगी तकनीक है जबकि इससे सस्ती तकनीक हमें उपलब्ध है।

हाल ही में देश के 60 से भी अधिक बुद्धिजीवियों ने सरकार को जैतापुर परमाणु संयंत्र को मंजूरी देने में किसी भी तरह की हड़बड़ी से बचने की सलाह दी है। पूव नौसेना प्रमुख एडमिरल एल. रामदास, एम.वी. रमना व पी. के. भार्गव जैसे विख्यात वैज्ञानिकों की इस चेतावनी पर सरकार को समुचित ध्यान देना चाहिए।

श्री भारत डोगरा प्रबुद्ध एवं अध्ययनशील लेखक हैं।

लेख साभार - http://www.hindi.indiawaterportal.org/node/30718 



 

भगवान बचाएं परमाणु ऊर्जा से !


जिस पदार्थ की राख या बचा हुआ हिस्सा रेडियोधर्मी होकर अगले ढाई लाख वर्षों तक जहरीला बना रहे, ऐसे पदार्थ के जहरीलेपन की सीमा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारत में पिछले कुछ वर्षों से ऊर्जा के क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा को लेकर सुनहरे सपने दिखाए जा रहे हैं। यह आलेख परमाणु ऊर्जा के खतरों के बारे में है। पानी-पर्यावरण पर होने वाले प्रभावों को सामने लाने का प्रयास यहां किया गया है।

लेखिका - हेलन काल्डिकोट   

इस वक्त दुनियाभर में 438 परमाणु रिएक्टर कार्यरत हैं। परमाणु ऊर्जा उद्योग के सुझावों के अनुसार जीवाश्म ईंधन पर आधारित ऊर्जा संयंत्रों को परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से बदलने के लिए 1000 मेगावाट के 2 से 3 हजार नए परमाणु संयंत्र निर्मित करना होंगे। इसका अर्थ हुआ अगले 50 वर्षों तक प्रति सप्ताह एक परमाणु ऊर्जा संयंत्र का निर्माण! इस तथ्य के दृष्टिगत कि अमेरिका में सन् 1978 के पश्चात एक भी नया परमाणु संयंत्र स्थापित नहीं हुआ है, यह विचार ही अव्यावहारिक लगता है। अगर हम जीवाश्म आधारित सारे विद्युत संयंत्र बदलने की सोच भी लें तो हमें यह भी याद रखना होगा कि इस स्थिति में आर्थिक रूप से सक्षम परमाणु ईंधन की उपलब्धता मात्र 8 वर्ष तक के लिए संभव हो पाएगी।

वैसे परमाणु उद्योग की अर्थव्यवस्था का अभी तक ठीक-ठाक आकलन ही नहीं हुआ है। उदाहरण के लिए यूरेनियम संवर्द्धन पर आने वाली लागत पर अमेरिकी सरकार जबरदस्त सब्सिडी देती है। संचालन के दौरान दुर्घटना होने की स्थिति में अमेरिका में मुआवजे की अधिकतम सीमा 600 अरब अमेरिकी डॉलर है। इसमें से मात्र 2 प्रतिशत जवाबदारी निजी क्षेत्र की है शेष 98 प्रतिशत अमेरिकी सरकार द्वारा देय है। इसके अलावा अमेरिका में वर्तमान में कार्यरत सभी परमाणु रिएक्टरों को बंद करने (डी-कमीशन) की लागत भी करीब 33 अरब अमेरिकी डॉलर बैठेगी। इसमें वह लागत मौजूद नहीं है, जो कि रेडियोएक्टिव पानी को आगामी दो लाख पचास हजार वर्ष तक सुरक्षित रखने में आएगी। यह भी कहा जाता है कि परमाणु ऊर्जा प्रदूषण रहित है। परंतु सच इससे बहुत अलग है। अमेरिका में विश्वभर में सर्वाधिक यूरेनियम का संवर्द्धन किया जाता है। वहां ऐसी सुविधा वाले पाडुकाह संयंत्र में इसके संवर्द्धन हेतु 1500 मेगावाट वाले कोयला संयंत्र जितनी विद्य़ुत ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है, जिससे बड़ी मात्रा में कार्बन डाईआक्साइड का उत्सर्जन होता है। उपरोक्त एवं ओहियो स्थित एक अन्य संयंत्र पोटर््समाउथ पूरे देश में उत्सर्जित होने वाली क्लोरोलोरोकार्बन (सीएससी) गैस के 93 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए जवाबदार हैं। पोटर्समाउथ संयंत्र तो 2001 में बंद हो गया है, लेकिन केंटुकी संयंत्र अभी भी कार्य कर रहा है।

मोंट्रियल समझौते के तहत अब सीएससी गैस के उत्पादन और उत्सर्जन पर रोक लग गई है क्योंकि यह ओजोन को नुकसान पहुंचाने के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी है। वैसे भी यह गैस कार्बनडाईआक्साइड से 20,000 गुना अधिक गरम होती है। वास्तविकता तो यह भी है कि परमाणु ईंधन चक्र के प्रत्येक चरण जैसे खनन व पीसने, परमाणु रिएक्टर व कूलिंग टॉवर का निर्माण, यूरेनियम का 20 से 40 वर्ष की जीवन अवधि की समाप्ति पर, अत्यधिक रेडियोधर्मी रिएक्टर को डी-कमीशन करने में रोबोटों की सहायता, परिवहन एवं बड़ी मात्रा में रेडियोधर्मी अपशिष्ट के भंडारण में अत्यधिक जीवाश्म ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है।

परमाणु उद्योग के इस प्रचार कि यह ऊर्जा पर्यावरण अनुकूल और साफ-सुथरी है, के विरोध में यही कहा जा सकता है कि दोनों ही बातें महज भ्रामक प्रचार ही हैं। परमाणु रिएक्टर प्रतिवर्ष पानी एवं वायु में करोड़ों रेडियोधर्मी समस्थानिक के सूक्ष्म कण छोड़ते हैं। इनका वायुमंडल में प्रवाह पूर्णतया अनियंत्रित है क्योंकि परमाणु उद्योग की निगाह में ये विशिष्ट रेडियोधर्मी तत्व जैविक रूप से नगण्य हैं। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। आयोडीन 131 सेल्लाफील्ड (ब्रिटेन), चेरनोबिल (रूस) और थ्री माईल आईलेण्ड (अमेरिका) से परमाणु दुर्घटना के दौरान निकला था। यह 6 हतों तक रेडियोधर्मी बना रहा और दूध एवं सब्जियों के माध्यम से मानव शरीर के फेफड़ों व अंतड़ियों में पैठ कर गया और अंत में इससे गर्दन में स्थित थायराईड का कैंसर विकसित हुआ। चेरनोबेल के निकट बेलारूस में सन् 1986 से 2000 के मध्य आठ हजार से अधिक बच्चों, किशोरों और वयस्को में थायराईड कैंसर पाया गया। ऐसी मिसाल चिकित्सा इतिहास में अन्यत्र नहीं मिलती। वही स्ट्रोंटियम-90 की आयु भी 600 वर्ष है और यह गाय एवं बकरी के दूध के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर स्तन, हड्डी और खून का कैंसर पैदा कर सकता है। केईसियम 137 की आयु भी 600 वर्ष है और यह जानवरों के मांस में प्रवेश कर जाता है। इसके माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर यह सरकोमा नामक मांसपेशियों का कैंसर उत्पन्न करता है। प्लूटोनियम 239 का जीवन ढाई लाख वर्ष का है। यह दुनिया का सर्वाधिक जहरीला पदार्थ है। इसके एक ग्राम के 10 लाखवें हिस्से से भी कम से कैंसर हो सकता है। यह हड्डी और यकृत में लोहे की तरह जम जाता है और कैंसर को जन्म देता है। इसके माध्यम से आनुवांशिक बीमारियां हो सकती हैं, जिससे कि भावी पीढ़ी तक प्रभावित होगी। इसके अलावा क्रिप्टोन, झेनोन, आरगन व ट्रिटियम गैसों से भी आनुवांशिक बीमारियां हो सकती हैं।

विश्व के 438 परमाणु संयंत्रों से निकलने वाले रेडियाधर्मी कचरे को लेकर सारा विश्व परेशान है। 1000 मेगावाट का परमाणु संयंत्र प्रतिवर्ष 33 टन रेडियोधर्मी कचरा पैदा करता है। अमेरिका के 102 परमाणु संयंत्रों की छत पर स्थित कूलिंग संयंत्रों में 80,000 टन अत्यधिक रेडियोधर्मी कचरा पड़ा है। इसे ठिकाने लगाने के लिए अभी तक भंडारण हेतु स्थान ही नहीं मिल पाया है।

लम्बे समय तक रेडियोधर्मी कचरे को रखना भी अपने आप में एक समस्या है। 1987 में अमेरिकी संसद ने लासवेगास से 150 कि.मी. उत्तर पश्चिम में नेवेदा में स्थित युक्का पर्वत को इस कचरे के भंडारण के लिए चुना था। परंतु अपने ज्वालामुखी स्वभाव व भूकंप अनुकूल भौगोलिक स्थिति के कारण इस स्थान को भंडारण के उपयुक्त नहीं पाया गया। आतंकवादी हमलों के अंदेशे ने भी अब इसके भंडारण में जोखिम बढ़ा दी हैं। रेडिएशन के संपर्क में आने के 5 से 60 वर्ष की अवधि के भीतर कभी भी कैंसर हो सकता है। इसका सर्वाधिक प्रभाव बच्चों, वृद्धों और उन व्यक्तियों पर पड़ता है जिनकी प्रतिरोधक शक्ति का पहले ही ह्रास हो चुका हो। परमाणु ऊर्जा स्पष्टया जहरीली विरासत छोड़कर जाती है। यह वातावरण को गरम करने वाली गैसों को उत्पन्न करती है, साथ ही यह विद्युत उत्पादन के किसी भी अन्य प्रकार या स्वरूप से अधिक खर्चीली है तथा यह कभी भी परमाणु हथियारों को बढ़ावा दे सकती है। (सप्रेस/थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क फीचर्स)
परिचय - हेलन काल्डिकोट फिजिशियन फॉर सोशल रिसपांसिबिलिटी की सह-संस्थापक हैं तथा इन्होंने परमाणु ऊर्जा पर सात पुस्तकों का लेखन भी किया है।
 

नागरिकों की मांग: भारत परमाणु कार्यक्रम बंद हो






 लोगों में जापान में हुई परमाणु त्रासदी पर संवेदना जगाने, जापान के लोगों के साथ सहानुभूति व्यक्त करने, और भारत के परमाणु कार्यक्रम को बंद करने के लिये लखनऊ में आज पी.एम.टी कॉलेज, हजरतगंज में परिचर्चा और परिवर्तन चौक पर मोमबत्ती प्रदर्शन आयोजित किया गया.

जापान में हुई परमाणु आपात स्थिति के बाद तो इस बात पर किसी संदेह का प्रश्न ही नहीं उठता है कि दुनिया में सभी परमाणु कार्यक्रमों को, चाहे वो सैन्य या उर्जा के लिये हों, उनको जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी बंद करना होगा. इन परमाणु ऊर्जा-घरों में दुर्घटनाओं और सैन्य हमले (हिरोशिमा-नागासाकी पर अटम बम) की वजह से मानवजाति ने सिर्फ अपूर्व, भयानक और अदम्य त्रासदी ही देखी है, जिसको असंख्य प्रभावित लोगों ने सदियों तक झेला है. यह तो स्पष्ट है कि परमाणु शक्ति चाहे वो ऊर्जा बनाने में लगे अथवा बम, यह सबसे खतरनाक विकल्प है. इसमें कोई शक नहीं कि समय रहते बिना विलम्ब दुनिया में परमाणु निशस्त्रीकरण हो जाना चाहिए जिससे कि 'सुरक्षा', 'ऊर्जा पूर्ति' या 'तकनीकि विकास' के नाम पर भयावही परमाणु हादसे मानवजाति को अब और न झेलने पड़ें.

हमारी मांग है कि भारत-अमरीका परमाणु समझौता और अन्य परमाणु कार्यक्रमों को भी मानवता और विश्व शान्ति के लिये तुरंत बंद किया जाए.

हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए अटम बम हमले, जो इतिहास के सबसे वीभत्स त्रासदी रहे हैं, के ६५ साल के बाद भी जिस देश ने इन हमलों को अंजाम दिया था, आज तक उस देश अमरीका ने माफ़ी नहीं मांगी है. जिस उत्साह के साथ भारत, भारत-अमरीका परमाणु समझौते को लागू कर रहा है, यह अत्यंत चिंता का विषय है.

पर्यावरण के लिए लाभकारी तरीकों से उर्जा बनाने के बजाय भारत परमाणु जैसे अत्यंत खतरनाक और नुकसानदायक ऊर्जा उत्पन्न करने के तरीकों को अपना रहा है. विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा एक असफल प्रयास रहा है. विश्व में अभी तक परमाणु कचरे को नष्ट करने का सुरक्षित विकल्प नही मिल पाया है, और यह एक बड़ा कारण है कि विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा के प्रोजेक्ट ठंडे पड़े हुए हैं. भारत सरकार क्यों भारत-अमरीका परमाणु समझौते को इतनी अति-विशिष्ठ प्राथमिकता दे रही है और इरान-पाकिस्तान-भारत तक की गैस पाइपलाइन को नकार रही है, यह समझ के बाहर है.

किसी भी देश क लिए ऊर्जा सुरक्षा के मायने यह हैं कि वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति इस तरीके से हो कि सभी लोग ऊर्जा से लाभान्वित हो सकें, पर्यावरण पर कोई कु-प्रभाव न पड़े, और यह तरीका स्थायी हो, न कि लघुकालीन. इस तरह की ऊर्जा नीति अनेकों वैकल्पिक ऊर्जा का मिश्रण हो सकती है जैसे कि, सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, छोटे पानी के बाँध आदि, गोबर गैस इत्यादि.

जापान ने कभी भी परमाणु बम नहीं बनाया पर परमाणु शक्ति का ऊर्जा के लिये इस्तेमाल किया था. परमाणु ऊर्जा भी कितनी खतरनाक हो सकती है यह जापान में हुए परमाणु आपात स्थिति से आँका जा सकता है. भारत में न केवल अनेकों परमाणु ऊर्जा-घर हैं बल्कि परमाणु बम भी है - और दुनिया में सबसे अधिक संख्या में गरीब लोग हैं. न केवल परमाणु शक्ति अत्यंत खतरनाक विकल्प है, भारत जैसे देशों के लिये परमाणु शक्ति में निवेश करना, लोगों की मूल-भूत आवश्यकताओं को नज़रंदाज़ करके 'सुरक्षा', 'ऊर्जा' के नाम पर ऐसा समझौता करने जैसा है जिसके कारणवश लोग कई गुना अधिक मार झेल रहे हैं.

भारत में शायद ही कोई ऐसा परमाणु ऊर्जा घर हो जहां कोई न कोई दुर्घटना न हुई हो. जिन स्थानों पर भारत में परमाणु कचरे को डाला जाता है, जहां परमाणु ऊर्जा घर लगे हुए हैं, जहां परमाणु खान हैं, आदि, वहाँ पर रहने वाली आबादी रेडियोधर्मिता का भीषण कुप्रभाव झेल रही है. उदाहरण के तौर पर कुछ महीने पहले ही कईगा परमाणु केंद्र में ५० से अधिक लोग रेडियोधर्मी त्रिशियम का प्रकोप झेले थे.

परमाणु दुर्घटनाओं की त्रासदी संभवत: कई पीढ़ियों को झेलनी पड़ती है जैसे कि भोपाल गैस काण्ड और हिरोशिमा नागासाकी त्रसिदियों को लोगों ने इतने बरस तक झेला. हमारी मांग है कि भारत बिना-देरी शांति के प्रति सच्ची आस्था का परिचय दे और सभी परमाणु कार्यक्रमों को बंद करे.

[एस.आर.दारापुरी, अरुंधती धुरु, रंजित भार्गव, प्रो० रंजित भार्गव, प्रो० एम.सी.पन्त, प्रो० रमा कान्त, डॉ० संदीप पाण्डेय, आनंद त्रिपाठी, एवं अन्य नागरिक]

परमाणु निशस्त्रीकरण और शांति के लिये गठबंधन, शांति एवं लोकतंत्र के लिये लखनऊ चिकित्सकों का समूह, जन-आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, आशा परिवार एवं लोक राजनीति मंच के संयुक्त तत्वावधान मे आयोजित













फ़ुकुशिमा के अंधेरे में छलाँग लगाने को तैयार भारत



अणुमुक्ति

११ मार्च की सुनामी के बाद फ़ुकुशिमा के कम-से-कम चार अणु-बिजलीघरों में हो रहा विकिरण का जहरीला रिसाव अब तक थमा नहीं है और इस बीच जर्मनी, पोलैंड, स्वीडन, इटली और फ़्रांस समेत पूरे युरोपीय यूनियन ने परमाणु उद्योग के पुनरीक्षण के अदेश दिये हैं. चीन, जहाँ भारत के अलावा अणु-भट्ठियों के सबसे बड़ी योजना चल रही है, ने भी अपने परमाणु कार्यक्रम की समीक्षा के बाद ही आगे बढने के संकेत दिये हैं. फिलीपीन्स, जोर्डन, और वियतनाम जैसे कई देशों ने, जो अपना परमाणु कार्यक्रम शुरु करने वाले थे, भी फ़ुकुशिमा के बाद पुनर्विचार शुरु कर दिया है. वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति बरक ओबामा ने नई पीढ़ी के सुरक्षित रिएक्टरों को अपना समर्थन दिया है और २०१२ के बजट में अमेरिकी संसद से परमाणु उद्योग के लिये ३६ बिलियन डॉलर की लोन गारंटी का अनुरोध किया है. वहीं  अमेरिका फ़ुकुशिमा के बाद भी भारत के साथ होने वाले परमाणु-व्यापार को लेकर आश्वस्त है. ६ अप्रैल को दक्षिणी और मध्य एशिया मामलों के जिम्मेवार उपसचिव राबर्ट ब्लेक ने अमेरिकी संसद में यह बयान दिया कि भारत ने अमेरिका से हुए परमाणु करार को लेकर  अपनी प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं दिखाई है.

भारत और अमेरिका फुकुशिमा की भयावह त्रासदी के बाद भी अपने परमाणु-दम्भ पर कायम रहने वाले गिने-चुने देशों में हैं. ज़ाहिर है २००५ में हुए दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्रों के मिलन को फ़ुकुशिमा की मानवीय त्रासदी अबतक पिघला नहीं पा रही है. और ना ही दुनिया में लोकतंत्रों के समर्थन के लिये हुई इस ग्लोबल पार्टनरशिप को इस बात से कोई फ़र्क पड़ता है कि जैतापुर से लेकर हरियाणा के फ़तेहाबाद और आंध्र के कोव्वाडा तक, पंचायतों और जन-सुनवाइयों जैसी लोकतंत्र की जमीनी इकाइयों ने परमाणु परियोजनाओं को ठुकरा दिया है. हर जगह भारी पुलिसिया दमन के बीच लोकतंत्रों के इस मिलन का खेल जारी है. पिछले साल परमाणु उपादेयता विधेयक को लेकर भारत सरकार ने अपने ही स्वास्थ्य, जल-संसाधन, वन एवं पर्यावरण इत्यादि कई मंत्रालयों की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए इस खतरनाक कानून को मंजूरी दी. जैतापुर को दी गई मंजूरी के समय भी पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने स्वीकार किया कि उनपर पर्यावरणीय चिंताओं से ऊपर परमाणु-करार के अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भों को तरजीह देने का दबाव था. खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह १९९० के दशक में बतौर वित्तमंत्री परमाणु ऊद्योग के खराब प्रदर्शन को लेकर टिप्पणियाँ करने और उसका बजट कम करने के लिए जाने जाते हैं. हाल में हुए विकीलीक्स के खुलासों ने यह भी जाहिर कर दिया है कि  परमाणु-करार को लेकर संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर हुई वोटिंग के लिए जमकर धांधली हुई. लोकतांत्रिक और साफ़ सार्वजनिक जीवन के उन सिद्धांतों की धज्जियाँ सरेआम उड़ाई गईं जिनकी दुहाई देते मनमोहन सिंह और संप्रग की नेता सोनिया गांधी नहीं थकते.

तो, आखिर वे कौन से व्यापक राष्ट्रीय हित हैं जिनकी खातिर परमाणु उद्योग की आर्थिक असफलता, इसकी खतरनाक दुर्घटनाओं और तीखे जन-विरोध सबको नजरंदाज किया जा रहा है.

परमाणु राजनीति में आए अन्तर्राष्ट्रीय बदलाव और न्यूक्लियर डील
भारत परमाणु करार के बाद अणु-ऊर्जा के महत्वाकांक्षी विस्तार की ओर अग्रसर है और देश के विभिन्न हिस्सों में कुल ३९ नए रिएक्टर प्रस्तावित हैं. लेकिन भारत के शासकवर्ग और इसके चियरलीडर मीडिया के लिए परमाणु-करार का मतलब अणु-ऊर्जा की उपलब्धि से कहीं ज़्यादा है. १८ जुलाई २००५ को अमेरिका के साथ साझा घोषणापत्र से लेकर भारतीय संसद में हुई अविश्वास-प्रस्ताव की बहस तक,  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, और प्रणव मुखर्जी से लेकर सरकार-समर्थक मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग ने भी इस करार के दूरगामी लाभों का हवाला दिया. देश परमाणु प्रतिष्ठान को भी पूरी तरह इस करार के बारे में विश्वास में नहीं लिया गया था और चंद सर्वोच्च पदस्थ अधिकारियों को छोड़कर खुद परमाणु ऊर्जा आयोग और इससे जुड़े संस्थानों का एक धड़ा शुरुआती सालों में असमंजस में रहा. परमाणु ऊर्जा विभाग की २००४ में प्रकाशित दीर्घकालीन नीति में कहीं भी आयातित रिएक्टरों की ज़रूरत की चर्चा न होना और इसके २००८ के संस्करण के आंकड़ों में आनन-फ़ानन में ४० गीगावाट की आयातित परमाणु-क्षमता को देश के लिये ज़रूरी बताना इसकी ओर इशारा करता है.

दरअसल, परमाणु करार में मूलतः १९७४ के बाद लगी उन पाबंदियों से छुटकारा मिला जो अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय ने भारत पर इसके शांतिप्रिय विस्फ़ोट के पहले पोखरण परीक्षणों के बाद लगाई थीं. इन पाबंदियों की अगुआई तब खुद अमेरिका ने की थी. अब इस करार के तहत अमेरिका ने अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) के बुनियादी नियमों - जो इन्हें परमाणु अप्रसार संधि (NPT) से बाहर के देशों को परमाणु तकनीक संबंधी सहयोग देने से रोकते हैं - को झुकाते हुए उन्हें भारत के लिए अपवाद का रास्ता खोलने पर मजबूर किया. जार्ज बुश के नेतृत्व में अमेरिका ने ऐसा अपने बदलले हुए रणनीतिक हितों के लिये किया. सत्तर और अस्सी के दशक में सोवियत रूस के साथ परमाणु हथियारों की होड़ के साथ ही अमेरिका, और रूस के लिये भी, यह ज़रूरी थी कि इन हथियारों तक बाकी देशों की पहुँच रोकी जाए. नब्बे के दशक में सोवियत रूस के पतन के साथ ही यह लक्ष्य ओझल हो गया. १९९५ में एन.पी.टी. को अनिश्चितकालीन विस्तार देने के बाद भी अमेरिका के लिए परमाणु अप्रसार एक नीति और सिद्धांत के बतौर   गैर-ज़रूरी हो गया. उसने न सिर्फ़ उत्तर-शीतयुद्धकालीन विश्व में परमाणु निरस्त्रीकरण की व्यापक आशा पर पानी फेरा बल्कि NPT के सीमित लक्ष्यों से भी पीछा छुड़ाना शुरु कर दिया. जहां वर्ष २००० में हुई एन.पी.टी. पुनरीक्षा बैठक (NPT Review Conference,  जो हर पांच साल पर होती है) में बहुत मुश्किल से सहमति बन पाई, वहीं जार्ज बुश ने २००५ के Review Conference को असफल हो जाने दिया. १९७५ से ही इन सभी Review Conference में गैर-परमाणु शक्ति देश खासतौर पर तीसरी दुनिया और निर्गुट आंदोलन के देश विश्व के पांचों परमाणु-सम्पन्न देशों पर NPT के अनुच्छेद छः में किए गए निरस्त्रीकरण के वादे को पूरा करने के लिये दबाव डालते रहे हैं. २००५ की असफल NPT पुनरीक्षा बैठक के क्रम में ही यह साफ़ हो गया था कि अमेरिका की प्राथमिकता अब परमाणु-हथियारों के प्रसार को पूरी तरह रोकना नहीं बल्कि अपने चुनिंदा देशों को परमाणु क्षेत्र में बढ़ावा देना और वैसे देशों को दंडित करना जिन्हें अमेरिका अपने हितों के प्रतिकूल और आतंकवाद के खिलाफ़ युद्ध में अपने साथ खड़ा नहीं देख रहा था. इसी बदले हुए सिद्धांत और तर्कपद्धति के आधार पर भारत को परमाणु मदद की शुरुआत हुई जिसने कुछ ही सालों पहले विश्व-जनमत और अपनी जनता के वास्तविक हितों को ठेंगा दिखाते हुए परमाणु परीक्षण किये थे. इस प्रक्रिया के समानांतर, ईरान और इराक पर परमाणु बम अथवा व्यापक विनाश के हथियार रखने का अरोप लगाकर अमेरिका ने दबिश शुरु की. जहां इराक को तहस-नहस करने के बाद भी कोई हथियार वहाँ नहीं मिला, वहीं खुद IAEA के यह मानने के बावजूद कि कम-से-कम अब तक ईरान का परमाणु कार्यक्रम शांतिप्रिय है, अमेरिका ईरान पर अपनी गुंजलकें कसता जा रहा है जबकि मध्य एशिया में ज़्यादा खतरा इज़राएल के अवैध परमाणु-हथियारों और उसकी विस्तारवादी नीतियों के कारण है. 

अपने रणनीतिक हितों के अलावा, भारत को परमाणु सहयोग शुरु करने में अमेरिकी व्यावसायिक हितों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है. सत्तर के दशक से मंदी झेल रही अमेरिकी परमाणु कम्पनियों का पुनर्वास इस डील से होना था जिससे उन्हें १० बिलियन डॉलर से अधिक का व्यापार मिलने वाला है. पिछले तीस सालों में थ्री-माइल आइलैंड और चेर्नोबिल सरीखी भीषण परमाणु दुर्घटनाओं ने जहाँ परमाणु कम्पनियों के कारोबार को बुरी तरह प्रभावित किया था वहीं तीसरी दुनिया में इस तकनीक के करोबार पर परमाणु-अप्रसार के सरोकारों से भी असर पड़ रहा था. परमाणु-ऊर्जा और परमाणु-बम बनाने की तकनीक लगभग एक जैसी होती है और ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देशों ने परमाणु ऊर्जा के नाम पर मिलने वाली विदेशी मदद के सहारे ही अपने सामरिक कार्यक्रम विकसित किए हैं. लेकिन १९५३ के अमेरिकी राष्ट्रपति आइज़नहावर के 'Atoms for Peace' नीति के से लेकर खुद NPT के अनुच्छेद चार में परमाणु हथियार न विकसित करने के एवज में इस संधि के हस्ताक्षरकर्ता देशों को परमाणु के शांतिप्रिय प्रयोग हेतु मिले  निर्बाध हक तक, अन्ततः हथियार-निर्माण में काम आने वाली परमाणु ऊर्जा तकनीक को पूरी अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था का भरपूर समर्थन मिलता रहा है. इस तकनीक के बेजा इस्तेमाल से रोकने के लिये IAEA की निगरानी से लेकर हाल के वर्षों में हथियारों में काम न आ सकने वाली परमाणु तकनीक (proliferation-proof technology) का ही निर्यात समेत कई वैधानिक और तकनीकी उपक्रम मौजूद हैं, लेकिन इन सबके बावजूद जिन देशों को बम बनाना है वे बना ही रहे हैं. खुद अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यह मानती है कि पिछले दशकों में शांतिप्रिय उद्देश्यों के नामपर परमाणु तकनीक हासिल करने वाले देशों में बीस से अधिक देश ऐसे हैं जो बम-निर्माण की चौखट पर खड़े (Threshold Nuclear States) हैं और उन्हें बम बनाने के लिये मात्र राजनीतिक निर्णय की ज़रूरत है. इस बढ़ते खतरे के बावजूद, परमाणु मुद्दे पर यह दोमुँहापन इसलिये कायम है कि परमाणु कम्पनियों के मुनाफ़े पर कोई आँच न आए. यह स्थिति बहुत कुछ ऐसी ही है जो ग्लोबल वार्मिंग पर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की हालत है जहाँ तमाम सदिच्छाएँ और निर्णीत प्रदूषण-नियंत्रण रेखाएँ पूंजीवादी हवस के आगे धरी की धरी रह जाती हैं.

तो बदली राजनीतिक स्थिति और आर्थिक मंदी के माहौल में, अमेरिका के लिए भी यह ज़रूरी हो गया था कि वह परमाणु अप्रसार के सिद्धांतों को ताक पर रखते हुए अपने व्यावसायिक और रणनीतिक हितों का पोषण करे. परमाणु अप्रसार एक बहुत ही सीमित सिद्धांत है और जबतक महाशक्तियों के पास हज़ारों परमाणु बम बने रहते हैं तब तक नित नए देशों को बम का आकर्षण लुभाता रहेगा. लेकिन फिर भी, चूँकि नए देशों के पास बम उपलब्ध होने से अस्थिरता बढ़ेगी और निरस्त्रीकरण की राह मुश्किल होती जाएगी क्योंकि तकनीकी तौर पर परमाणु बमों को नष्ट करना भी एक मुश्किल प्रक्रिया है और अनिवार्यतः यह गोपनीय एजेंसियों के हाथों होता है इसलिये बमों के छुपे अस्तित्व की सम्भावना बनी रहती है. इन्हीं वजहों से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर परमाणु अप्रसार की भी अपनी प्रासंगिकता बनी हुई है. इसीलिये भारत-अमेरिका परमाणु करार का विरोध अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर निरस्त्रीकरण समर्थक समूहों द्वारा भी किया गया था. सितम्बर २००८ में जब भारत पर लगी परमाणु-कारोबार संबंधी बंदिशें हटाने के लिये परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) की बैठक विचार कर रही थी, तो नागासाकी से परमाणु-बम के भुक्तभोगी हिबाकुशा के एक समूह ने पत्र लिखकर एन.एस.जी. को कहा कि यह एक बुरी परम्परा की शुरुआत है. दुनिया में परमाणु बम बनाने के लिये नए आकर्षण पैदा होंगे जब दूसरे देश देखेंगे कि अपने विशालकाय बाज़ार को अमेरिका के लिये खोलकर भारत जैसा देश परमाणु-परीक्षण के बाद प्रतिबंधों और अन्तर्राष्ट्रीय पाबंदियों को हटवा सकता है.

यहाँ यह भी ध्यान रखना ज़रूरी होगा कि व्यापक निरस्त्रीकरण के कोण से परमाणु डील के इस अन्तर्राष्ट्रीय विरोध के उलट, भारत में इस डील का विरोध इस बात पर टिका था कि इस करार के बाद भारत की परमाणु-परीक्षण करने की क्षमता छिन जाएगी और भारत का स्वदेशी परमाणु-ऊर्जा कार्यक्रम बाधित होगा. विरोध की इस बेवकुफ़ाना ज़मीन पर भाजपा के साथ-साथ देश का वामपंथ भी खड़ा था और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि परमाणु डील का विरोध करने के बावजूद पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार प्रदेश के नाज़ुक भौगोलिक इलाके में स्थित हरिपुर में परमाणु रिएक्टर लगाने पर आमादा है. काँग्रेस से लेकर भाजपा और वामपंथ तक, परमाणु ऊर्जा के मुद्दे पर ऐसी भयावह आम-सहमति क्यों है, इसको समझना भी यहाँ ज़रूरी है.

भारत ने इस डील को अपनी बढ़ती हुई ताकत के रूप में देखा और वास्तव में यह इसके परमाणु कार्यक्रम की वैधता पर मुहर जैसा था । इस हैसियत को हासिल करने के लिये भारत ने उन सभी साधनों का इस्तेमाल किया जो उसके पास थे- चीन के खिलाफ़ अमेरिका का साथ दे सकने की भू-रणनीतिक क्षमता का आकर्षण, अमेरिका के आतंक के खिलाफ़ युद्ध में उसका समर्थन, अरबों डॉलरों वाले परमाणु बिजली क्षेत्र में अमेरिकी कम्पनियों को हिस्सा देने का लालच और साथ ही अमेरिकी बाजार-शक्तियों के साथ उस संश्रय का उपयोग जो भारत ने अपने फैलते मध्यवर्गीय उपभोक्ता-वर्ग और अमेरिका-स्थित संतसिंह चटवाल जैसे कारोबारियों के आधार पर पिछले दो दशकों में बनाया है. परमाणु परीक्षणों के बाद भी दुनिया की न्यूक्लियर बिरादरी में इस न्यौते से भारतीय सरकार और मध्यवर्ग के एक बड़े हिस्से को अपने उस सुपर पावर सपने को सच करने का रास्ता नज़र आ गया. यह सपना दूर के रिश्ते में भारतीय ठहरने वाले किसी व्यक्ति की विदेश में सफलता से लेकर सॉफ़्ट्वेयर उद्योग में सस्ता श्रम बेचने वाले एन.आर.आई में, हमें जहाँ कहीं भी दिख जाता है, हम चिपक जाते हैं.

भारत का परमाणु कार्यक्रम
भारत का परमाणु कार्यक्रम दुनिया की शुरुआती परमाणु परियोजनाओं में से एक है. होमी जहाँगीर भाभा ने टाटा ट्रस्ट के साथ मिलकर Tata Institute of Fundamental Research (TIFR) की नींव 1944 में ही रख दी थी और आज़ादी के एक साल के अन्दर और देश का संविधान बनने के पहले ही जवाहरलाल नेहरु ने 15 अप्रैल 1948 को परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना हेतु परमाणु ऊर्जा कानून (Atomic Energy Act)  को मंजूरी दे दी थी. यह स्वाधीनता संग्राम के आखिरी दशकों में नेहरू के नेतृत्व में भावी भारत के कांग्रेसी सपने का ही विस्तार था, जो गांधी के सपनों के भारत से काफ़ी अलग होना था. नेहरू ने अपनी प्राथमिकताएँ पहले ही तय कर दी थीं कि उनका भारत आधुनिक तकनीक-केंद्रित पश्चिमी ढंग का केंद्रीकृत संसदीय लोकतंत्र होगा. परमाणु तकनीक से नेहरु जी को विशेष लगाव था और उनका मानना था कि जैसे भाप के ईंधन की खोज में पश्चिमी देश अगे निकल गए तो उन्होंने कई सदियों तक दुनिया को राह दिखाई, वैसे ही अगर परमाणु तकनीक ऐसी चीज़ है जिसमें भारत अगुआ बन जाए तो दुनिया के विकसित मुल्कों के साथ इस मामले में बराबरी के स्तर पर सहयोग और नेतृत्व कर सकता है. अब परमाणु डील के पिछले रास्ते से ही सही, परमाणु शक्तियों की बिरादरी में जगह मिलने की इसी हड़बड़ी में हमारे देश के नेता, मीडिया और मध्यवर्ग इस तकनीक के खतरे, भारतीय सन्दर्भ में इसकी प्रासंगिकता और इस डील के दौरान हुए भ्रष्टाचार, सबको नजरअंदाज करने पर उतारू हैं.

नेहरू के आधुनिक भारत के मंदिरों के निर्माण में न भारत की असली ज़रूरतों का ध्यान रखा जाना था और न ही हमारी ज़मीनी सच्चाईयों का. इन आधुनिक मंदिरों ने भारत को कोई वास्तविक विकास तो नहीं ही दिया, सामाजिक हकीकतों से भी दूर रखा और इन आधुनिक मंदिरों के पुजारी भी वही बने रहे जो सदियों से महंती कर रहे थे. इसमें आश्चर्य नहीं कि मेरिट और तकनीकी उच्चता के नाम पर परमाणु ऊर्जा विभाग ने अपने परिसर में अबतक सामाजिक न्याय को लागू नहीं होने दिया है और आरक्षण-विरोधी मुहिम में देश के आईआईटी और एम्स जैसे उच्च-तकनीकी केंद्र सबसे आगे रहे हैं. तकनीकी विकास और देश की ज़रूरतों में जबतक एकसूत्रता नहीं रहेगी, तबतक सबसे पढा-लिखा तबका भी देश और समाज की ज़रूरी हलचलों के खिलाफ़ खडा मिलेगा. बहरहाल, भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को देश के लोकतंत्र से ऊपर रखा गया है. परमाणु से जुड़े मामले शुरु से सीधे प्रधानमंत्री के दायरे में आते हैं और राष्ट्रीय बजट से लेकर auditing तक इस पर कोई खुलापन नहीं है.

भारत शुरू से दुनिया भर में परमाणु हथियारों के सफाए के लिए मुहिम चलाने वाले देशों में शामिल रहा है. बावजूद इसके इसने कांग्रेस के शासन काल (1974) में शांतिपूर्ण विस्फोट और दोबारा भाजपा के शासन काल (1998) में परमाणु बम परीक्षण किया. ज़ाहिर सी बात है कि परमाणु परीक्षण एक दिन की तैयारी में संभव नहीं होता, इसके लिए वर्षों  के वैज्ञानिक शोध, परीक्षणों और तैयारी की एक पूरी श्रृंखला की जरूरत होती है. दुनियाभर में सबको बिना शर्त परमाणु बम नष्ट करने चाहिए, इस तर्क के आधार पर भारत ने खुद को एन.पी.टी. के अप्रसार तंत्र से और सी.टी.बी.टी. की परमाणु परीक्षण पर रोक की व्यवस्था से बाहर भी  रखा. भारत द्वारा 1974 के परमाणु परीक्षण में विदेशी तकनीक, खास तौर पर कनाडाई, अमेरिकी और रूसी मदद से हासिल क्षमता और तजुर्बे का इस्तेमाल किया गया था ।

भारत की घोषित शांतिप्रिय परमाणु नीति में हथियार-निर्माण की मंशा शुरू से शामिल थी या नहीं, इस पर शोधकर्ताओं में अभी तक मतभेद बना हुआ हैं, लेकिन इतना तो तय है कि भारत ने दुनिया भर में समय-सीमा के अन्तर्गत और पूर्ण निरस्त्रीकरण की वकालत के बीच भी हथियार निर्मित करने के अपने विकल्प को तकनीकी तौर पर खुला रखा और अपनी क्षमता सचेत रूप से बढ़ाई. भारत ने इस बीच गुटनिरपेक्ष आंदोलन और तीसरी दुनिया की एकता का नारा भी बुलंद किया और अपने लिये मौजूदा विश्व-व्यवस्था में ही जगह बनाने के बाद इन सिद्धांतों को तिलांजलि देने में थोड़ी भी झिझक नहीं दिखाई. इस तरह भारत के शासक वर्ग ने विकसित और विकासशील दोनों दुनियाओं को साधा और इस प्रक्रिया में देश के अंदर की प्रगतिशील जमात को अपने चरित्र के बारे में भ्रम में रखा. आज भी, प्रदूषण-उत्सर्जन के लक्ष्य तय करने के मसले पर तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक सौदेबाजियों में किसानों और मजदूरों के संरक्षण के नाम पर मूलतः देश के बड़े औद्योगिक घरानों का हित ही साधा जा रहा है. हालिया सम्पन्न कोपेनहेगन सम्मेलन में भारत द्वारा विकासशील देश होने के नाम पर अमेरिका समर्थित प्रस्तावों में अपने लिये जगह बनाने और अन्ततः उसी के साथ खड़े होने को साफ़ देखा जा सकता है.

पूरे सरकारी समर्थन और संरक्षण के बावजूद परमाणु ऊर्जा विभाग अपने ही निर्धारित लक्ष्यों पर हर बार बुरी तरह असफल रहने के मामले में भारत सरकार का सबसे निकम्मा विभाग साबित हुआ है.१९६२ में खुद होमी भाभा ने दावा किया था  कि १९८७ तक भारत में १८-२० हज़ार मेगावाट की परमाणू बिजली क्षमता होगी. असल में १९८७ में परमाणु बिजली क्षमता १.०६ हज़ार मेगावाट - भाभा के आकलन का लगभग पाँच प्रतिशत - रही. भाभा के बाद परमाणु ऊर्जा आयोग की कमान सम्भालने वाले विक्रम साराभाई ने खुद स्वीकार किया कि यह कार्यक्रम अपने लक्ष्य से बुरी तरह पिछड़ चुका है. इस खाई को पाटने के लिये १९७२ से प्रतिवर्ष ५०० मेगावाट क्षमता के रिएक्टर जोड़ने की बात साराभाई ने की, लेकिन ५०० मेगावाट का पहला रिएक्टर तारापुर में कुल पैंतीस साल बाद २००५ में अस्तित्व में आया. इस पिछड़ेपन को आमतौर पर १९७४ के परीक्षण के बाद आने वाली दिक्कतों के माथे मढ़ दिया जाता है, लेकिन १९८४ में भी परमाणु ऊर्जा आयोग की योजना के मुताबिक वर्ष २००० तक १०,००० मेगावाट बिजली का लक्ष्य घोषित किया गया था. यह १९८९ की योजना में भी दुहराया गया और यह विश्वास दिखाया गया कि यह लक्ष्य पूरी तरह प्राप्य है. २००३ में जब आयोग इस लक्ष्य के नज़दीक भी नहीं पहुँच पाया तो आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोडकर ने अगले चार सालों में ६८०० मेगावाट बिजली का नया लक्ष्य सामने रखा. २०१० में कुल उत्पादन ४१२० मेगावाट रहा जो देश में पैदा कुल बिजली का तीन प्रतिशत से भी कम है. ध्यान रहे कि भारत में दूरस्थ बिजलीघरों से शहरों और गावों के उपभोग केंद्रों तक बिजली पहुँचाने के दौरान होने वाला नुकसान (Transmission loss) तीस प्रतिशत से भी ज़्यादा है.

विदेशी करार दरअसल परमाणु ऊर्जा विभाग के लिये आपनी नाकामियाँ छुपाने और आयातित रिएक्टरों के भरोसे नए लक्ष्यों का डंका बजाने का बहाना बन गए हैं. नए दावों के मुताबिक भारत २०२० तक २०,००० मेगावाट, २०३० तक ६३,००० मेगावाट और २०५० तक २७५,००० मेगावाट बिजली परमाणु ऊर्जा से बनाएगा. २०५० तक भारत की कुल बिजली का ३५ प्रतिशत परमाणु ऊर्जा से आएगा. अनुमानों के मुताबिक अगर सबकुछ योजना के मुताबिक चलता रहा तो आने वाले बीस सालों तक इसमें प्रतिवर्ष ३५ से ४० हज़ार करोड़ तक निवेश की दरकार होगी, जबकि परमाणु ऊर्जा विभाग का इतिहास यह बताता है कि इसके पिछले दस रिएक्टर अपने निर्धारित समय के वर्षों देर से शुरु हो पाए और इससे उनकी लागत में ३०० प्रतिशत से अधिक का इज़ाफ़ा हुआ.

परमाणु ऊर्जा का विस्तार और इसकी समस्याएँ
परमाणु ऊर्जा के अभी के उत्पादन से सौ गुना विस्तार की यह महत्वाकांक्षी योजना कई ऐसे अनिश्चित कारकों पर टिकी है, जिनपर न परमाणु ऊर्जा आयोग का नियंत्रण है, न खुद भारतीय सरकार का. इस पूरी योजना का एक महत्त्वपूर्ण शुरुआती हिस्सा आयातित रिएक्टरों पर टिका है जिनमें कई तरह की बाधाएँ हैं - इन रिएक्टरों की कीमत बहुत ज़्यादा होगी, इनसे बनने वाली बिजली भी बहुत महँगी होगी और उपभोक्ताओं को रास न आने पर सरकार को इसका खर्च वहन करना पड़ेगा जिससे एनरॉन सरीखी बड़ी असफलता का सामना करना पड़ सकता है. साथ ही, देश के हर हिस्से में इन रिएक्टरों को लेकर जुझारू प्रतिरोध हो रहे हैं जिनसे इसमें बाधा आएगी, अगर ये प्रस्तावित परियोजनाएँ रोकी न जा पाएँ तब भी इनमें स्थानीय वजहों से देर ज़रूर लगेगी और तब इनकी लागत बढ़ती जाएगी. फ़ुकुशिमा के बाद युरोप में परमाणु ऊर्जा पर पुनर्विचार चल र्हा है और इस कारण हुई देरी और रिएक्टर सुरक्षा नियमों में आनेवाली कड़ाई भी महँगी पड़ने वाली है. परमाणु ऊर्जा आयोग के अनुसार चालीस हज़ार मेगावाट क्षमता भर विदेशी रिएक्टर आयात करने के बाद भारत का द्वितीय-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम शुरु होगा, जो वस्तुतः फास्ट ब्रीडर तकनीक पर आधारित होगा. फास्ट ब्रीडर तकनीक बहुत महँगी और अत्यधिक खतरनाक साबित हुई है जिसकी वजह से जापान और फ़्राँस जैसे देशों ने इससे पीछा छुड़ा लिया है. लेकिन भारत न सिर्फ़ इस तकनीक के व्यामोह पर कायम है बल्कि इस आशा पर कि वर्ष २०२५ तक व्याव्सायिक रूप से उपयोग होने लायक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर बनाने लगेगा, इस समूची महत्वाकांक्षी योजना को अंजाम दे रहा है. फास्ट ब्रीडर तकनीक में रिएक्टर के अंदर शीतक के रूप में द्रवित सोडियम का इस्तेमाल होता है जिसे सम्भालना बहुत ज़्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि सोडियम गलती से भी हवा या पानी के सम्पर्क में आने पर विस्फ़ोट करता है. इसी तरह भारतीय परमाणु योजना का तीसरा चरण २०४० के आस-पास शुरु होगा जिसमें इन फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों से प्राप्त प्लूटोनियम, थोरियम के साथ मिलाकर ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाना है. अभी थोरियम तकनीक भी पूरी दुनिया में कहीं नहीं है, सिर्फ़ कुछ सैद्धांतिक शोध इस क्षेत्र में हुए हैं. ज़ाहिर है, परमाणु बिजली के भरोसे २०५० तक की यह योजना एक झाँसे से अलग कुछ नहीं है.


फ़ुकुशिमा में विनाश और भारत के लिये सबक
जापान में चल रही परमाणु तबाही अभी थमी नहीं है. उत्तर-पूर्वी जापान के सेन्दाई प्रांत स्थित फ़ुकुशिमा दाई-इचि में कुल छः रिएक्टर हैं जिनमें से चार पूरी तरह बेकाबू हो गये है. समुद्र में विकीरण की मात्रा सामान्य से ७५ लाख गुना अधिक बताई जा रही है और फ़ुकुशिमा के रिएक्टरों से कुल ११,५०० मिलियन लीटर विकीरण-युक्त पानी प्रशांत महासागर में छोड़ा गया है. फ़ुकुशिमा रिएक्टरों की संचालक कम्पनी टेपको के मुताबिक ऐसा इसलिये करना पड़ा कि रिएक्टर नम्बर-१ से कोर से निकल रहे और भी अधिक जहरीले रिसाव को जमा करने के लिये जगह बनाई जा सके. यह सब रोंगटे खड़े कर देने वाली खबरें हैं. ११ मार्च की भयावह सुनामी ने इन रिएक्टरों की शीतन-व्यवस्था (coolant) को छिन्न-भिन्न कर दिया था और साथ ही आपातस्थिति में शीतन के लिये प्रयोग होने वाले डीजल-चालित जेनेरेटरों को भी नाकाम कर दिया था. लगातार शीतन के अभाव में रिएक्टर के अंदर हज़ारों डिग्री तापमान पर तप रहा परमाणु ईंधन बेकाबू हो गया है. उसे ठंडा करने के लिये पिछले हफ़्ते से सैकड़ों टन समुद्र का पानी उड़ेला जा रहा है. पहले तो बाहर से फेंके जा रहे इस पानी ने भाप बनकर फ़ुकुशिमा दाई-इचि के छह में से चार रिएक्टरों के बाहरी कंक्रीट आवरण को उड़ा दिया, वहीं अब खबर आ रही है कि समुंदर के पानी के साथ आया सैकड़ों टन नमक इन रिएक्टरों में जमा हो गया है और यह रिएक्टर के केंद्रक को ढँकने वाले स्टील में दरार पैदा कर सकता है. साथ ही, यह नमक परमाणु ईंधन ने ऊपर मोटी परत बनकर इकट्ठा हो रहा है जिससे उसे ठंढा करना और भी मुश्किल होता जाएगा. वैसे पानी की आपूर्ति अभी भी पर्याप्त नहीं हो पायी है और लगातार भयानक विकिरण और गर्मी छोड़ती परमाणु ईंधन की छड़ों के २ मीटर तक पानी से बाहर होने आशंका है.  इन रिएक्टरों में पड़े पहले के शेष ईंधन (spent fuel) के भी बाहरी वातावरण के सम्पर्क में आने की पुष्टि हुई है. यह शेष ईंधन भी अत्यधिक विकिरण-कारी और गरम होता है. 

२५ मार्च को फ़ुकुशिमा दाइ-इचि नम्बर-३ रिएक्टर में तीन मजदूरों की हालत गम्भीर हो गई जब रिएक्टर से रिस रहा भारी विकिरण-युक्त पानी से उनके पैर जल गये. दूषित पानी रिएक्टर नंबर १ और २ से भी निकल रहा है और इससे यह अनुमान भी लगाया गया कि इन रिएक्टर के मूल बरतन (main vessel) में दरार आई है जिसके अंदर सामान्य स्थिति में रेडियोधर्मी ईंधन जलाया जाता है जिसके ताप से पानी गर्म किया जाता है और फिर बिजली बनती है. फुकुशिमा रिएक्टरों की संचालक कंपनी टेपको के अनुसार अब्तक १०,५००

सीटीबीटी ऑर्गनाइजेशन (CTBTO) के आंकड़ों के मुताबिक इस दुर्घटना से हुए विकिरण-रिसाव की मात्रा अबतक ही १९८६ में रूस में हुई चेर्नोबिल दुर्घटना के आधे से अधिक पहुँच चुकी है. चेर्नोबिल अब तक दुनिया की सबसे बड़े परमाणु-दुर्घटना है जिससे रूस और युरोप के एक बड़े हिस्से में दशकों तक रेडियेशन-जनित कैंसर और अन्य बीमारियाँ होती रही हैं और हाल के आंकड़ों के मुताबिक कुल नौ लाख लोग चेर्नोबिल के शिकार हुए हैं. दुनिया की बाकी सरकारों की तरह ही जापान की सरकार भी परमाणु-हादसों से जुड़ी सूचनाएँ छुपाती रही है और फुकुशिमा दुर्घटना में भी सरकारी लीपापोती के आरोप लग रहे हैं. खुद जापान के परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व-अध्यक्ष ने कहा है कि सरकार लोगों को अंधेरे में रख रही है. अमेरिका, फ्रांस इत्यादि देशों और अंतर्रराष्ट्रीय परमाणु-विशेषग्यों ने जापान सरकार की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं. अमेरिका ने तो अपने उपग्रहों से मिली जानकारी के अधार पर जापान में अपने नागरिकों को रिएक्टर से ८० किमी दूर चले जाने को कहा है जबकि जापान सरकार ने पिछले दो हफ़्तों में इस दायरे को ३ किमी से धीरे-धीरे बढाकर अब ३० किमी किया है. रिएक्टरों के आस-पास स्थित विकिरण मापन यंत्रों की सूचना भी जापानी एजेंसियाँ ठीक-ठीक नहीं जारी कर रही हैं. जब विकिरण का स्तर बढता है तो जारी सूचना का अन्तराल बढाकर एक से डेढ़ घंटे कर दिया जाता है जबकि विकिरण के निचले स्तरों पर हर दस मिनट पर विकिरण की माप जारी की जा रही है. साथ ही, जापानी एजेंसियां टेपको (Tokyo Electric Production Company) और नीसा (Nuclear and Industrial Safety Authority) वातावरण में सिर्फ़ सीज़ियम-१३७ और आयोडीन-१३१ की मात्रा की जानकारी दे रही हैं और आयोडीन-विकिरण की काट के लिये लोगों को आयोडीन की गोलियाँ बाँटीं जा रहीं हैं, जबकि इस दुर्घटना से ट्रीशियम, स्ट्राँशियम  और प्लूटोनियम जैसे कई अन्य रेडियोधर्मी जहर भी फैल रहे हैं. इस दुर्घटना से निपटने में अपनी जान जोखिम में डाल रहे फ़ुकुशिमा फ़िफ़्टी नाम से प्रचारित किये जा रहे जाँबाज दरअसल अधिकतर वहाँ ठेके पर काम करने वाले मजदूर हैं, जिनकी जान की वैसे भी पूरी दुनिया में सस्ती समझी जाती है.

हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने भारत के रिएक्टरों की सुरक्षा-समीक्षा के लिये कहा है, लेकिन यह पूरी जाँच कागजी कारवाई से ज़्यादा कुछ साबित नहीं होगी क्योंकि हमारे देश में परमाणु-उद्योग के नियमन के लिये जिम्मेदार संस्था (परमाणु ऊर्जा नियमन बोर्ड- AERB) खुद परमाणु ऊर्जा अयोग (DAE) के मातहत काम करती है. इस विरोधाभास पर देश के कई प्रमुख विशेषग्य और जनपक्षधर समूह लगातार आवाज़ उठाते रहे हैं. भारत में पहले से चल रहे अणु-बिजलीघर भी फ़ुकुशिमा जैसी त्रासदी की सम्भावना से मुक्त नहीं हैं. मुम्बई के बहुत नजदीक स्थित तारापुर रिएक्टर अमेरिकी कम्पनी जी.ई. (General Electrics) के उसी मार्क-वन डिज़ाइन के रिएक्टर हैं, जो फ़ुकुशिमा में हैं. इन रिएक्टरों में द्वितियक नियंत्रण ढाँचे (secondary containment structure) का अभाव है और शेष ईंधन (spent fuel) रिएक्टर के ऊपरी हिस्से में जमा होता है. तारापुर में पिछले चार दशकों से इकट्ठा यह अत्यधिक रेडियोधर्मी कचरा अमेरिका न तो वापस ले जा रहा है और ना ही भारत को इसे पुनर्संश्लेषित (reprocessing) करने दे रहा है. उत्तरप्रदेश के नरोरा स्थित परमाणु-संयत्र में शीतन के लिये जरूरी बिजली पूरे २४ घंटे गुल होने और नियंत्रण-कक्ष की मशीनें फुँक जाने की घटना १९९३ में हो चुकी है.  जपान के अब तक दुनिया के सबसे सुरक्षित और तकनीक-सम्पन्न माने जाने वाले रिएक्टरों में मची तबाही और अफ़रा-तफ़री से यह साफ़ दिख जा रहा है कि परमाणु तकनीक अपनेआप में असुरक्षित है और कितनी कोशिशों के बाद भी एक छोटी सी चूक, प्राकृतिक आपदा या आतंकी घटना इन बिजलीघरों को दशकों के लिए जानलेवा बना सकती है.


परमाणु ऊर्जा पर पुनर्विचार ज़रूरी
परमाणु बिजली भारत की ऊर्जा-सुरक्षा का भी हल नहीं है. ऊर्जा-सुरक्षा का सवाल सिर्फ़ परमाणु और कोयले की बिजली या नवीकरणीय ऊर्जा-स्रोतों के बीच चुनाव का सवाल नहीं है. यह ऊर्जा उत्पादन से जुड़ी पूरी राजनीतिक-अर्थव्यवस्था और उपभोग-संस्कृति का सवाल है. पिछ्ले पंद्रह सालों में बिजली-उत्पादन दुगुना करने के बाद भी बिजली के बिना रहने वाले गाँवों की संख्या में कोई खास फ़र्क नहीं पड़ा है. मॉल, विग्यापन और हाईवे केंद्रित आज के विकास में ऊर्जा का अतिशय अपव्यय होता है. साझा उत्पादन, सुचारू सरकारी परिवहन इत्यादि सकारात्मक कदम और एक ही चीज के कई ब्रांडों से बाज़ार पाटने के पूँजीवादी अपव्यय से पिंड छुड़ाने जैसे कई आमूलचूल परिवर्तनों के बिना ऊर्जा का कोई भी स्रोत तेजी से लुप्त होते प्राकृतिक संसाधनों के बीच हमें ऊर्जा-सुरक्षा नहीं दे सकता.

आजकल परमाणु ऊर्जा के को कार्बन मुक्त और जलवायु परिवर्तन का हल बताया जाता है. लेकिन अणु-ऊर्जा के उत्पादन में युरेनियम खनन, उसके परिवहन से लेकर रिएक्टर के निर्माण तक काफी कार्बन खर्च होता है जिसकी गिनती नहीं की जाती. अणु-ऊर्जा से बिजली बनती है, गाड़ियाँ नहीं चलतीं और पेट्रोल के अत्यधिक इस्तेमाल से हो रहे पर्यावरणीय नुकसान के मामले में यह कोई विकल्प नहीं है. मैसाचुसेट्स तकनीकी संस्थान (MIT) के अनुसार जलवायु-परिवर्तन को कुछ हद तक रोकने के लिये कम-से-कम एक हज़ार परमाणु रिएक्टर चाहिए जबकि एक रिएक्टर के निर्माण में आठ से दस साल तक लगते हैं. २०५० तक अगर पूरी दुनिया में परमाणु बिजली उत्पादन चगुना भी कर दिया जाय तो इससे होने वाली कुल कार्बन कटौती सिर्फ़ चार प्रतिशत ही होगी, जबकि २०२० के उच्चतम कार्बन उत्सर्जन के स्तर के बाद २०५० तक दुनिया में ८० से ९० प्रतिशत कार्बन कटौती की ज़रूरत होगी. ऐसे में, जलवायु परिवर्तन से बचने के लिये परमाणु विकल्प एक धोखा भर है.  साथ ही फ़ुकुशिमा ने यह भी साबित कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन का समाधान होने की बजाय अणु-ऊर्जा केन्द्र दरअसल बदलते जलवायु और भौगोलिक स्थितियों को झेल नहीं पाएंगे क्योंकि इन्हें बनाते समय वे सारी स्थितियां सोच पाना मुमकिन नहीं जो जलावायु-परिवर्तन भविष्य में अपने साथ लेकर आ सकता है. चालीस साल पहले फ़ुकुशिमा के निर्माण के समय जापान में इतनी तेज सुनामी की दूर-दूर तक सम्भावना नहीं थी, वैसे ही जैसे भारत में कलपक्कम अणु-ऊर्जा केंद्र को बनाते समय सुनामी के बारे में नहीं सोचा गया था. अधिकतम पचास-साठ साल तक काम करने वाले इन अणु-बिजलीघरों में उसके बाद भी हज़ारों सालों तक रेडियोधर्मिता और परमाणु-कचरा रहता है. ऐसे में, इतने लम्बे भविष्य की सभी भावी मुसीबतों का ध्यान रिएक्टर-डिजाइन में रखा गया है, यह दावा आधुनिकता और तकनीक के अंध-व्यामोह के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता है.

विग्यान परमाणु कचरे का कोई समाधान अब तक नहीं ढूँढ पाया है और ज़्यादातर रिएक्टरों के आसपास ही इसे सिर्फ़ भंडारित करके रखा जाता है. एक औसत रिएक्टर साल भर में २० से तीस टन उच्च-स्तरीय जहरीला कचरा निकालता है. इसमें प्लूटोनियम-२३९ (अर्ध-आयु २४,००० साल) और युरेनियम-२३५ (७१० मिलियन वर्ष) से लेकर नेप्चूनियम, स्ट्राँशियम, सीज़ियम, और ट्रीशियम जैसे कई अन्य जहर भी होते हैं जो कई दशकों तक जानलेवा बने रहते हैं. इन जहरीले पदार्थों की कोई भी खुराक सुरक्शःइत नहीं होती और अपने सम्पर्क में आने वाली आबादी से लेकर पेड़-पौधों तक में इनके विकीरण से दूरगामी दुष्प्रभाव पड़ते हैं. 

परमाणु ऊर्जा की अन्तर्राष्ट्रीय कार्पोरेट लॉबी के दावों और प्रचार के विपरीत, पिछले दशक में दुनिया में परमाणु ऊर्जा का उत्पादन लगातार घटा है. २००९ की World Nuclear Industry Status Report के मुताबिक दुनिया भर में चालू रिएक्टरों संख्या वर्ष २००२ में २४४ से घटकर २००९ में ४३८ रह गई है और निर्माणाधीन कुल ५२ रिएक्टरों में २६ ऐसे हैं जो बीस सालों से इस लिस्ट में हैं. एक अन्य विशेषग्य समूह के अनुसार, साल २०३० तक विश्व में रिएक्टरों की संख्या दरअसल तीस प्रतिशत घटने वाली है. परमाणु बिजलीघरों की लागत में अत्यधिक पूँजी की ज़रूरत होती है जो लगातार बढ़ रही है. अमेरिका में प्रति मेगावाट अणु-बिजली निर्माण का खर्च १९७० में २००० डॉलर से बढ़कर २०१० में दस हज़ार डॉलर तक जा पहुँचा है. युरेनियम की बढ़ती कीमत और इसके खनन के बढ़ते खर्च से भी आने वाले समय में परमाणु बिजली और अधिक महँगी होने वाली है. दुनिया में कहीं भी परमाणु बिजली बिना भारी सरकारी सब्सिडी के नहीं चल पा रही है. अमेरिका में १९४७ तक परमाणु ऊर्जा को मिलने वाली कुल सरकारी मदद ११५ बिलियन डॉलर थी जबकि इसी अवधि में पवन और सौर ऊर्जा को सिर्फ़ ५.७ बिलियन डॉलर की मदद मिली.

अगले बीस सालों में परमाणु-बिजली उत्पादन को दस गुने से भी ज़्यादा करने की इस सनक में देश के कई हिस्सों में लोगों को जबरन बेदखल किया जा रहा है. साथ ही, पर्यावरणीय प्रभावों के मुकम्मल अध्य्यन के बिना और भूकम्प तथा आपदा-सम्भावित इलाकों में इन रिएक्टरों को लगाया जा रहा है. महाराष्ट्र के जैतापुर, जो कोंकण के बहुत सुंदर-समृद्ध लेकिन भूकम्प सम्भावित और नाजुक समुद्र-तटीय क्षेत्र में स्थित है, में फ्राँस से आयतित कुल छह EPR रिएक्टर लगाए जा रहे हैं. फ्रांसीसी कम्पनी अरेवा के इस रिएक्टर डिजाइन पर फ़िनलैंड, ब्रिटेन, अमेरिका और खुद फ्रांस की सुरक्षा एजेंसियों ने कुल तीन हज़ार आपत्तियाँ दर्ज की हैं. अरेवा का EPR रिएक्टर अबतक कहीं भी शुरु नहीं हुआ है. फ़िनलैंड में इसकी निर्माण-अवधि २ साल बढ़ानी पड़ी है जिससे इसकी लागत ७०% ज़्यादा हो गई है. पिछले साल UAE ने अपने यहाँ इस रिएक्टर डिजाइन की बजाय दक्षिणी कोरिया के एक रिएक्टर को चुना. लेकिन भारत सरकार तीव्र स्थानीय विरोध के बावजूद जैतापुर में इन रिएक्टरों को लगाने पर आमादा है. पिछले चार सालों से रत्नागिरि जिले के किसानों, मछुआरों, और आमलोगों ने इस रिएक्टर-परियोजना का विरोध किया है और सरकार द्वारा मुआवजे की रकम बढ़ाए जाने पर भी चेक स्वीकार नहीं किया है. उस इलाके में अंदोलन को समर्थन देने जाने वाले लोगों - जिनमें बम्बई उच्चन्यायालय के पूर्व- न्यायाधीश और देश के पूर्व-जलसेनाधिपति भी शामिल हैं - को बाहरी और भड़काऊ बताकर जिले में घुसने से मना किया जा चुका है, और जिले के नागरिक आंदोलनकरियों को जिलाबदर कर दिया गया है. दर्जनों लोगों को झूठे मुकदमों में जेल में डाल दिया गया है.  जैतापुर संयंत्र के इलाके में पड़ने वाले तीनों ग्राम-पंचायतों ने इस परियोजना के खिलफ़ आमराय से प्रस्ताव पारित किए हैं और फ़िर भी उनपर विस्थापन थोप दिया गया है. ज़ाहिर है सरकार सिर्फ़ फ़्रान्सीसी कम्पनी अरेवा को ही देशभक्त मानती है, बाकी सब उसके लिये बाहरी और गैर-ज़रूरी हैं. जैतापुर की तरह ही पश्चिम बंगाल के हरिपुर, आन्ध्र के कोवाडा, गुजरात के मीठीविर्डी, मध्य-प्रदेश के चुटका और हरियाणा के फ़तेहाबाद जैसे संवेदनशील भूभागों में भी ऐसी ही परियोजनाएँ शुरु की गई हैं, जिनका तीखा विरोध इन इलाकों में हो रहा है.

भारत और चीन दो ही ऐसे देश हैं जो रिएक्टरों के महत्वाकांक्षी विस्तार की ओर बढ़ रहे हैं. चीन में जहाँ एक ऐसा निज़ाम है जिसके लिए लोगों के जीवन या पर्यावरण की कोई कीमत नहीं वहीं भारतीय शासकवर्ग भी अपनी मदांधता में उन संकल्पों को रौंद रहा है जो इस देश के संविधान में हमने खुद से किये थे. सजग जनमत-निर्माण और व्यापक जन-गोलबंदी ही इस विनाशकारी पागलपन से देश को बचा सकते हैं.




 यह लेख 'सामयिक वार्ता' पत्रिका के मई अंक में सम्पादित रूप में छप चुका है 

...........